मध्य प्रदेश में नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहा विवाद अब फिर सुर्खियों में आ गया है. इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम निर्देश देते हुए राज्य स्तरीय छानबीन समिति को 60 दिनों के भीतर निर्णय लेने को कहा है. अदालत ने 24 अप्रैल को हुई सुनवाई के दौरान साफ किया कि अंतिम फैसला समिति ही करेगी. इसके बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है.
इस मंत्री की कुर्सी खतरे में
यह मामला कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है. उन्होंने मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र की वैधता पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. याचिका में आरोप लगाया गया है कि गलत तरीके से अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र लेकर चुनाव लड़ा गया और उसी आधार पर राजनीतिक लाभ हासिल किया गया.
क्या कहा प्रतिमा बागरी ने
इस पूरे विवाद पर मंत्री प्रतिमा बागरी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह मुद्दा कोई नया नहीं है और पहले भी कई बार उठाया जा चुका है. उन्होंने इसे केवल सुर्खियों में आने की कोशिश बताया. उनका कहना है कि इससे पहले भी इसी तरह की एक याचिका दायर हुई थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था. उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल उन्हें इस मामले में कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है, लेकिन जरूरत पड़ने पर वे सभी जरूरी दस्तावेज पेश करेंगी. साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि कांग्रेस में भी बागरी समाज से जुड़े जनप्रतिनिधि रहे हैं, इसलिए इस मुद्दे को बेवजह उछाला जा रहा है.
कांग्रेस ने जताई आपत्ति
वहीं कांग्रेस ने मंत्री के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है. पार्टी का कहना है कि यह कोई व्यक्तिगत या राजनीतिक प्रचार का मामला नहीं है, बल्कि सामाजिक और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर मुद्दा है. उनका दावा है कि यह लड़ाई सच्चाई सामने लाने के लिए लड़ी जा रही है.कांग्रेस की ओर से लगाए गए आरोपों के मुताबिक, ‘बागरी’ जाति अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं है. उनका कहना है कि मंत्री मूल रूप से राजपूत समुदाय से संबंध रखती हैं. याचिका में 1961-71 की जनगणना, 2003 की समिति रिपोर्ट और 2007 के राजपत्र जैसे दस्तावेजों का हवाला दिया गया है. साथ ही यह भी बताया गया है कि पहले इस मामले में एक याचिका दायर कर वापस ली गई थी, लेकिन बाद में नए साक्ष्यों के साथ दोबारा आवेदन किया गया.
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