डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/ जहां आज के दौर में रिश्तों की डोर कमजोर पड़ती दिख रही है, वहीं मध्य प्रदेश के सागर जिले के एक बेटे ने मातृ-सेवा की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसे देख हर आंख नम है और हर दिल श्रद्धा से भर गया है। सागर जिले के ग्राम भभूका (तहसील राहतगढ़) निवासी 65 वर्षीय सुदामा नाथजी अपनी 80 वर्षीय वृद्ध माता रामकली नाथजी को व्हीलचेयर पर बैठाकर नर्मदा परिक्रमा करा रहे हैं।
वर्षों पुरानी इच्छा और बेटे का संकल्प
सुदामा नाथजी ने बताया कि उनकी माताजी की बरसों से इच्छा थी कि वे जीवन में एक बार माँ नर्मदा की परिक्रमा करें। वृद्धावस्था और शारीरिक अक्षमता के कारण रामकली जी पैदल चलने में पूरी तरह असमर्थ थीं। लेकिन सुदामा जी के लिए माँ की इच्छा सर्वोपरि थी। उन्होंने तय किया कि संसाधनों की कमी या शारीरिक बाधाएं उनकी माँ की आस्था के आड़े नहीं आएंगी। उन्होंने एक व्हीलचेयर का प्रबंध किया और खुद पैदल चलते हुए उसे धकेलकर माँ को परिक्रमा पर ले निकले।
10 महीने का कठिन सफर और अटूट साहस
यह भावुक कर देने वाली यात्रा करीब 10 माह पूर्व पावन नगरी ओंकारेश्वर से शुरू हुई थी। पिछले 300 से अधिक दिनों से सुदामा नाथजी निरंतर पैदल चल रहे हैं। ऊबड़-खाबड़ रास्ते, पथरीली पगडंडियां, बदलते मौसम की मार और उम्र का पड़ाव, कोई भी बाधा सुदामा जी के कदमों को रोक नहीं सकी। वे हर दिन सुबह अपनी माताजी के साथ यात्रा प्रारंभ करते हैं और रास्ते में जहां सुविधा मिलती है, वहीं विश्राम करते हैं।सुदामा नाथ का कहना है कि मां की खुशी में ही मेरा सारा सुख है। उन्होंने मुझे चलना सिखाया था, आज अगर उनके पैर थक गए हैं, तो यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंच पा रहा हूं।
जहां से गुजरते हैं, थम जाते हैं लोगों के कदम
नर्मदा तट के किनारे और परिक्रमा मार्ग पर सुदामा नाथजी जहां भी पहुंचते हैं, लोग उन्हें देखकर दंग रह जाते हैं। राहगीर और ग्रामीण इस दृश्य को देखकर भाव-विभोर हो जाते हैं। लोग न केवल उन्हें नमन करते हैं, बल्कि स्वेच्छा से उनके भोजन और विश्राम की व्यवस्था में भी जुट जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के लिए संस्कारों का एक जीवित पाठ है।
समाज के लिए एक प्रेरणादायी संदेश
आज के समय में, जब अक्सर बुजुर्गों की उपेक्षा की खबरें सुनने को मिलती हैं, सुदामा नाथ की यह ‘व्हीलचेयर वाली परिक्रमा’ माता-पिता के प्रति कर्तव्य और समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण पेश करती है। यह यात्रा सिद्ध करती है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो संसाधन कभी आड़े नहीं आते। यह यात्रा अभी जारी है, और सुदामा नाथजी का लक्ष्य है कि वे माँ नर्मदा की यह परिक्रमा ससम्मान और पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न करें।


