मुंबई, भारत। अप्रैल का महीना ऑटिज्म जागरूकता और स्वीकृति को समर्पित है। यह समय न केवल न्यूरोडायवर्सिटी को अपनाने का है, बल्कि समावेशी शिक्षा और देखभालकर्ताओं की भूमिका पर भी ध्यान केंद्रित करने का है। 1970 में ऑटिज्म सोसायटी ऑफ अमेरिका द्वारा शुरू किया गया यह वैश्विक अभियान, जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस भी समर्थन देता है, समाज से गहरे जुड़ाव की अपील करता है। इस वर्ष का विषय, “भिन्नताओं का जश्न मनाएं,” समावेशी परिवेश को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
देखभालकर्ताओं के लिए मार्गदर्शन: ‘आई सी यू, आई गेट यू’
मुग्धा कालरा की नई पुस्तक “आई सी यू, आई गेट यू: द सेल्फ-केयर गाइड फॉर स्पेशल नीड्स पेरेंट्स” इस दिशा में एक उपयोगी संसाधन साबित हो रही है। इंडिया इंक्लूजन समिट और इंडियन न्यूरोडायवर्सिटी समिट में लॉन्च की गई यह पुस्तक परिवारों, शिक्षकों और नियोक्ताओं के लिए एक मार्गदर्शिका है।
मुग्धा कालरा, जो एक पुरस्कार विजेता पत्रकार और “नॉट दैट डिफरेंट” अभियान की सह-संस्थापक हैं, ने इस पुस्तक के माध्यम से विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के माता-पिता की भावनात्मक, सामाजिक और वित्तीय चुनौतियों पर प्रकाश डाला है। यह पुस्तक देखभालकर्ताओं को आत्म-देखभाल के महत्व को समझने और अपने बच्चों की बेहतर सहायता करने के लिए प्रेरित करती है। इसमें समावेशी कॉर्पोरेट नीतियों की चर्चा भी की गई है, जिससे नियोक्ता देखभालकर्ताओं को बेहतर समर्थन दे सकें।
ऑटिज्म जागरूकता क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में ऑटिज्म के मामलों में वृद्धि हो रही है, लेकिन जागरूकता और शीघ्र हस्तक्षेप की कमी अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस महीने मीडिया के पास एक महत्वपूर्ण अवसर है:
- ऑटिज्म क्या है और यह क्यों बढ़ रहा है?
- प्रारंभिक लक्षण और समय पर हस्तक्षेप का महत्व
- देखभालकर्ताओं और परिवारों की चुनौतियाँ
- कार्यस्थलों में समावेशी नीतियाँ
- विशेष आवश्यकताओं वाले परिवारों के लिए वित्तीय नियोजन
- न्यूरोडायवर्जेंट वयस्कों के लिए दीर्घकालिक सहायता मॉडल की जरूरत
- शिक्षा प्रणाली में समावेश और व्यवहारगत बदलाव
शिक्षकों के लिए ‘ध्वनि’: समावेशी कक्षा का समाधान
बुकोस्मिया के न्यूरोडायवर्सिटी एडवोकेसी वर्टिकल “नॉट दैट डिफरेंट” द्वारा पेश किया गया ‘ध्वनि’ एक ऐसा संसाधन है, जो शिक्षकों को समावेशी शिक्षा के लिए तैयार करता है। यह संसाधन शिक्षकों को विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए प्रभावी रणनीतियाँ प्रदान करता है और शिक्षकों की मानसिक भलाई पर भी ध्यान देता है।
‘ध्वनि’ में शिक्षा जगत के अग्रणी विशेषज्ञों का योगदान शामिल है, जैसे कि:
- डॉ. सुमति रवींद्रनाथ (भारतीय मोंटेसरी केंद्र की अध्यक्ष)
- भार्गवी रमन (अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय)
- चंपा साहा (संहिता अकादमी)
- पूजा सूद (ग्रीनवुड हाई इंटरनेशनल स्कूल)
- सोनाली सैनी (सोल आर्क)
एकस्टेप फाउंडेशन की नीति प्रमुख, दीपिका मोगिलीशेट्टी, इस पहल को बच्चों की असली क्षमताओं को पहचानने का एक सुनहरा अवसर मानती हैं।
बुकोस्मिया: बच्चों के लिए, बच्चों द्वारा
बुकोस्मिया (स्मेल ऑफ बुक्स) भारत में बच्चों के लिए सबसे बड़ा प्रकाशक है, जो युवाओं की आवाज़ को मंच प्रदान करता है। इसकी संस्थापक निधि मीरा, जो एक पूर्व बैंकर और एचएसबीसी की वाइस प्रेसिडेंट रह चुकी हैं, ने इस प्लेटफॉर्म के जरिए भारत और दुनिया भर के हजारों बच्चों की कहानियाँ प्रकाशित की हैं।
बुकोस्मिया ने 2017 से लेकर अब तक विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों, मानसिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और समावेश पर केंद्रित कंटेंट प्रकाशित कर एक नई मिसाल कायम की है। यह मंच बच्चों की सृजनात्मकता को बढ़ावा देता है और उन्हें अपनी आवाज़ बुलंद करने का अवसर प्रदान करता है।
निष्कर्ष
ऑटिज्म जागरूकता केवल अप्रैल तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे पूरे वर्ष लागू करने की आवश्यकता है। समावेशी नीतियाँ, शिक्षकों के लिए संसाधन, कार्यस्थलों पर सहयोग और परिवारों के लिए समर्थन प्रणाली को मजबूत करना आवश्यक है। इस दिशा में मुग्धा कालरा की पुस्तक ‘आई सी यू, आई गेट यू’ और ‘ध्वनि’ जैसे संसाधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह समाज के सभी वर्गों के लिए एक अवसर है कि वे न्यूरोडायवर्सिटी को अपनाएँ और हर व्यक्ति के लिए एक समावेशी भविष्य का निर्माण करें।


