भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ आदिवासी समुदाय केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में उनकी बड़ी आबादी निवास करती है। उनकी जीवन पद्धति, खान-पान, बोली-भाषा, वेशभूषा, सामाजिक परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं उन्हें अन्य समुदायों से अलग पहचान देती हैं। प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव के बावजूद आदिवासी समाज को लंबे समय से आर्थिक, सामाजिक और विकास से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन्हीं समुदायों के अधिकारों, सम्मान, सामाजिक विकास और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाया जाता है।
आदिवासी परंपराएं महत्वपूर्ण
आदिवासी समुदायों की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। इनके लोकगीत, नृत्य, भाषाएं, धार्मिक विश्वास, पर्व-त्योहार और सामाजिक परंपराएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। प्रकृति इनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। जंगल, पहाड़, नदियां, जमीन और अन्य प्राकृतिक संसाधन इनके जीवनयापन के प्रमुख आधार रहे हैं। समय के साथ जंगलों का कम होना, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव और तेजी से बदलती जीवनशैली ने आदिवासी समुदायों के सामने अपनी पारंपरिक पहचान और संस्कृति को बचाए रखने की चुनौती खड़ी की है। इसी पृष्ठभूमि में आदिवासी अधिकारों और उनके संरक्षण का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार महत्वपूर्ण होता गया।
प्रकृति के सबसे करीब है आदिवासी जीवन
आदिवासी समाज की जीवनशैली प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित रही है। पारंपरिक खान-पान में जंगल और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पेड़-पौधों, कंद-मूल, फल तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके अनेक त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान भी प्रकृति, फसल, वर्षा, जंगल और जलस्रोतों से जुड़े हुए हैं। दुनिया भर में आदिवासी समुदायों की संख्या करोड़ों में है और वे हजारों अलग-अलग भाषाओं तथा बोलियों का इस्तेमाल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के एक बड़े भूभाग पर आदिवासी समुदायों की मौजूदगी है। पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता को बचाए रखने में भी इन समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस की शुरुआत
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1994 में पहली बार 9 अगस्त को विश्व के आदिवासी समुदायों के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता दी। इसके बाद हर साल यह दिन आदिवासी समाज के अधिकारों, उनकी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़े विषयों पर चर्चा और जागरूकता का अवसर बन गया। आदिवासी समाज भी इस दिन अपने अधिकारों की बात करता नजर आता है। जुलूस और रैलियों के जरिए अपनी एकता को प्रकट करने का काम कर रहा है, जिसकी तस्वीर हर शहर में दिखाई देती है।
कोलंबस दिवस के विरोध से भी जुड़ा रहा इतिहास
अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस के इतिहास को अमेरिका में मनाए जाने वाले कोलंबस दिवस से जुड़े विवादों के संदर्भ में भी देखा जाता है। लंबे समय तक अमेरिका में 12 अक्टूबर को कोलंबस दिवस मनाया जाता रहा। लेकिन वहां के मूल निवासी समुदायों ने कोलंबस के आगमन और उसके बाद बनी उपनिवेशवादी व्यवस्था को अपने अधिकारों, जमीन और सांस्कृतिक अस्तित्व पर पड़े गहरे प्रभाव से जोड़कर देखा। इसी कारण मूल निवासी समुदायों की ओर से कोलंबस दिवस के स्थान पर मूलनिवासी या आदिवासी समुदायों की पहचान और अधिकारों को सम्मान देने वाले दिवस की मांग उठती रही। वर्ष 1977 में जिनेवा में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी आदिवासी समुदायों के अधिकार, उनकी पहचान और सामाजिक स्थिति से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया। इसके बाद वैश्विक स्तर पर आदिवासी अधिकारों को लेकर जागरूकता का दायरा लगातार बढ़ता गया।
भारत में भी बड़ी आदिवासी आबादी
भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता में जनजातीय समुदायों की अहम भूमिका है। देश के कई राज्यों में अलग-अलग आदिवासी समूह अपनी विशिष्ट परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के साथ निवास करते हैं। मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और बिहार सहित कई राज्यों में आदिवासी आबादी की बड़ी हिस्सेदारी है। मध्य प्रदेश में गोंड, भील, बैगा, सहरिया और कोरकू प्रमुख जनजातीय समुदायों में शामिल हैं। वहीं झारखंड में संथाल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया, बिरहोर और पहाड़िया जैसे समुदाय बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। गोंड भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में से एक है। इसकी आबादी मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में भी पाई जाती है। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में संथाल, बंजारा, बिरहोर, चेरो, खोंड, लोहरा, मुंडा, पहाड़िया और उरांव सहित अनेक जनजातीय समुदाय अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
सिर्फ उत्सव नहीं, अधिकारों की याद दिलाता है यह दिन
अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस का उद्देश्य केवल आदिवासी संस्कृति और परंपराओं का उत्सव मनाना नहीं है। यह दिन उनके समान अधिकार, सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाने का अवसर भी देता है।यह दिवस समाज और सरकार को यह संदेश देता है कि विकास की प्रक्रिया में आदिवासी समुदायों की भागीदारी और उनके अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। आर्थिक और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के साथ उनकी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति के साथ उनके पारंपरिक संबंधों को भी संरक्षित किया जाना चाहिए।
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