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सिनेब्रेशन 3.o में डिंडोरी का जलवा, 75 फिल्मों को पछाड़कर GUDUM बनी नंबर-1, सत्या परधान ने रचा नया कीर्तिमान

डिंडोरी के सत्या परधान ने फिल्म जगत में गाड़ा सफलता का झंडा

शैलेश नामदेव/ खबर डिजिटल/​डिंडोरी। मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य जिले डिंडोरी की माटी से उपजी एक असाधारण प्रतिभा ने वैश्विक सिनेमाई फलक पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। जिले के होनहार और धुन के पक्के युवा फिल्मकार सत्या परधान (सतपाल सिंह पंद्राम) ने भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव सिनेब्रेशन 3.o (2026) में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। सत्या की डॉक्यूमेंट्री फिल्म GUDUM: A Folk Drum ने इस महोत्सव में प्रथम पुरस्कार (गोल्ड) जीतकर न केवल डिंडोरी का, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश का मान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया है।

75 अंतरराष्ट्रीय फिल्मों के महाकुंभ में गुडुम का जलवा

​इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में भारत सहित दुनिया भर के विभिन्न देशों से लगभग 75 उत्कृष्ट फिल्मों की प्रविष्टियां आई थीं। विषयवस्तु और तकनीकी बारीकियों की कड़ी स्क्रीनिंग के बाद मुख्य समारोह में प्रदर्शन के लिए केवल 25 फिल्मों का ही चयन किया गया। सत्या परधान की फिल्म ने न केवल इन शीर्ष 25 फिल्मों में अपनी जगह सुरक्षित की, बल्कि डॉक्यूमेंट्री श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब जीतकर निर्णायक मंडल (ज्यूरी) को भी अचंभित कर दिया। यह जीत दर्शाती है कि आंचलिक कहानियों में वैश्विक स्तर पर प्रभावित करने का सामर्थ्य है।

​लोक संस्कृति को समर्पित एक ईमानदार प्रयास

​सत्या की यह पहली स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री फिल्म है, जो डिंडोरी की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और वहां के पारंपरिक वाद्य यंत्र गुडुम के इर्द-गिर्द बुनी गई है। यह फिल्म महज एक दृश्य प्रस्तुति नहीं है, बल्कि उन लोक कलाकारों के जीवंत संघर्षों और समर्पण की दास्तां है, जो आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी जड़ों को मजबूती से थामे हुए हैं। सत्या ने अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय अपनी अम्मा, संघर्षों में साथ देने वाले सहयोगियों और उन लोक कलाकारों को दिया है, जो अपनी पहचान को पूरी गरिमा और गर्व के साथ जी रहे हैं।

​संसाधनों के अभाव पर जिद की जीत

​डिंडोरी जैसे सुदूर और सीमित संसाधनों वाले क्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। तकनीकी उपकरणों की कमी और आर्थिक तंगहाली के बावजूद सत्या ने कभी घुटने नहीं टेके। उनकी निरंतर कोशिश और अपनी लोक कला को विश्व पटल पर लाने की जिद ने ही आज उन्हें इस गौरवशाली मुकाम पर पहुंचाया है। सत्या का मानना है कि डिंडोरी की माटी में कहानियों और असाधारण प्रतिभाओं का भंडार है, बस उन्हें तराशने और सही मंच देने की जरूरत है।

​जिले में हर्ष और सिनेमाई क्रांति की लहर

​सत्या की इस उपलब्धि से डिंडोरी के युवाओं में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार हुआ है। स्थानीय स्तर पर इसे एक सिनेमाई क्रांति के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में जिले की कई अनकही और अनसुनी कहानियों को सिनेमा के बड़े पर्दे तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त करेगी। प्रशासन और शासन से उचित सहयोग की उम्मीद के साथ सत्या अब भविष्य की नई संभावनाओं की ओर अग्रसर हैं.

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