MP Bjp Politics: मध्य प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा के लिए बाहर से सब कुछ सामान्य दिख सकता है, लेकिन अंदर ही अंदर गुटबाजी का लावा उबल रहा है। आलम यह है कि कांग्रेस पर गुटबाजी का आरोप लगाने वाली भाजपा आज खुद खेमों में बंटी नजर आ रही है। संगठन के मुखिया हेमंत खंडेलवाल की नियुक्ति और सक्रियता के बावजूद, पार्टी के अंदर की रार थमने का नाम नहीं ले रही है। स्थिति यह है कि सरकार के ढाई साल बीतने को हैं, लेकिन अब तक निगम-मंडलों और कई नियुक्तियों पर आम सहमति नहीं बन पाई है।
बैठकों का दौर बेनतीजा!
पिछले कुछ दिनों में भोपाल से दिल्ली तक सरकार और संगठन की कई दौर की बैठकें हुईं। यहां तक कि संघ, सरकार और संगठन के बीच हुई समन्वय बैठकें भी बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गईं। भाजपा जो कभी अपने कैडर बेस अनुशासन के लिए जानी जाती थी, आज वहां कार्यकर्ताओं में उत्साह की भारी कमी देखी जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष खंडेलवाल लगातार जिलों का प्रवास कर रहे हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं का बेमन होना पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
सीनियर बनाम जूनियर
पार्टी में इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती पीढ़ी परिवर्तन को लेकर है। भाजपा के पुराने आधार स्तंभ माने जाने वाले दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह, भूपेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव, विजय शाह और फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे चेहरे आज की नई व्यवस्था में फिट नहीं बैठ पा रहे हैं। वरिष्ठ नेता अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं हैं, वहीं नई पीढ़ी को कमान सौंपने की प्रक्रिया में टकराव की स्थिति बन रही है। संगठन ने विधायकों और सांसदों को जनता के बीच जाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन चिलचिलाती धूप में जनता से संवाद करने के बजाय नेता वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलने में हिचकिचा रहे हैं।
नियुक्तियों में देरी, साख पर सवाल
निगम-मंडलों में नियुक्तियों का लंबे समय से लंबित होना जहां सरकार की निर्णय क्षमता पर सवाल उठा रहा है, वहीं प्रदेश कार्यसमिति और प्रकोष्ठों की घोषणा न हो पाना संगठन की कमजोरी को उजागर कर रहा है। कार्यकारिणी घोषित होते ही विभिन्न गुटों के सक्रिय हो जाने के कारण पार्टी अब तक दस प्रमुख प्रकोष्ठों के अध्यक्ष तय नहीं कर पाई है। एल्डरमैनों की नियुक्तियां भी आधे-अधूरे मन से की गई हैं।
पहेली बनी गुटबाजी!
रणनीति बनाने में माहिर माने जाने वाले प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस गए हैं, जहां से निकलना उनके लिए बड़ी चुनौती है। नेताओं को करीब लाने की हर कोशिश उन्हें और दूर कर रही है। यदि वक्त रहते इस आंतरिक कलह पर काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले समय में भाजपा के लिए यह गुटबाजी एक बड़ी राजनीतिक मुसीबत बन सकती है।


