मुंबई : एसबीआई रिसर्च की नवीनतम ‘इकोवैप’ रिपोर्ट ने भारतीय अर्थव्यवस्था में एक अनोखे विरोधाभास को रेखांकित किया है, जहाँ डिजिटल क्रांति के चरम पर होने के बावजूद बाजार में नकदी का चलन (CiC) ₹40 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है। रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2026 तक मुद्रा के चलन में 11.1% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ नकदी की कुल मात्रा बढ़ी है, वहीं “कैश-टू-जीडीपी” अनुपात घटकर 11.5% रह गया है। यह डेटा इस ओर इशारा करता है कि भारतीय अब नकदी का उपयोग रोजमर्रा के लेनदेन के बजाय ‘मूल्य संचय’ (Store of value) और भविष्य की सुरक्षा के तौर पर अधिक कर रहे हैं।
विशेषज्ञों ने इस प्रवृत्ति के पीछे कई प्रमुख कारणों की पहचान की है, जिसमें एटीएम से निकासी में हुई 9.3% की वार्षिक वृद्धि और बड़े मूल्य के नोटों की मजबूत मांग शामिल है। रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक बदलावों के दौरान लोगों में एहतियाती तौर पर नकदी रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके अतिरिक्त, घरेलू बचत व्यवहार में भी बदलाव देखा जा रहा है, जहाँ लोग पारंपरिक वित्तीय बचत के स्थान पर भौतिक संपत्तियों और तात्कालिक उपभोग पर अधिक खर्च कर रहे हैं। एसबीआई रिसर्च ने स्पष्ट किया कि उच्च नकदी स्तर और उच्च डिजिटल पैठ का एक साथ होना भारतीय अर्थव्यवस्था की एक विशिष्ट विशेषता बनकर उभरा है।
डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण नीतिगत सलाह दी गई है कि यूपीआई (UPI) जैसे डिजिटल भुगतान माध्यमों को किसी भी प्रकार के शुल्क से हतोत्साहित (Disincentivize) नहीं किया जाना चाहिए। एसबीआई रिसर्च का मानना है कि भारत को ‘लेस-कैश’ अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने के लिए डिजिटल लेनदेन की सुगमता और इसकी शून्य-लागत प्रभावशीलता को बनाए रखना अनिवार्य है। किसी भी प्रकार का नया शुल्क ग्राहकों को पुनः नकदी के उपयोग की ओर धकेल सकता है, जो डिजिटल इंडिया के लक्ष्यों के विपरीत होगा।


