Monday, November 2, 2026
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Ayushman Yojana: आयुष्मान योजना में बड़ा बदलाव, 250 निजी अस्पताल हो सकते हैं बाहर; 1 अक्टूबर से लागू होगा नियम

आयुष्मान भारत योजना के तहत मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए मध्य प्रदेश में निजी अस्पतालों के नियम सख्त किए जा रहे हैं. भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के योजना से जुड़े अस्पतालों को मेडिसिन पैकेज के तहत मरीजों का इलाज जारी रखने के लिए नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स यानी एनएबीएच का फाइनल प्रमाणपत्र लेना जरूरी होगा.

अन्य पैकेज के लिए भी अस्पतालों को कम से कम एंट्री लेवल एनएबीएच की मान्यता हासिल करनी होगी. यह नई व्यवस्था 1 अक्टूबर से लागू होने वाली है.

छह महीने की मिली थी अतिरिक्त मोहलत

स्वास्थ्य विभाग ने इस शर्त को पहले 1 अप्रैल से लागू करने की तैयारी की थी. हालांकि, निजी अस्पताल संचालकों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर नियम लागू करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था. इसके बाद सरकार ने अस्पतालों को छह महीने की मोहलत दे दी.

अब विभाग ने साफ कर दिया है कि समय सीमा को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. ऐसे में चारों बड़े शहरों में संचालित करीब 250 निजी अस्पताल आयुष्मान योजना से बाहर हो सकते हैं. दूसरी ओर, जिन अस्पतालों में आयुष्मान के ज्यादा पैकेज हैं और मरीजों की संख्या भी अधिक है, उन्होंने एनएबीएच प्रक्रिया तेज कर दी है.

छोटे शहरों के अस्पतालों को फिलहाल राहत

भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के अलावा प्रदेश के दूसरे जिलों में एनएबीएच को फिलहाल अनिवार्य नहीं बनाया गया है. हालांकि, जिन अस्पतालों के पास यह प्रमाणन होगा, उन्हें योजना में शामिल होने की प्रक्रिया में कुछ राहत दी जा सकती है.

प्रदेश में इस समय 816 निजी अस्पताल आयुष्मान योजना से जुड़े हैं. इनमें 465 अस्पताल यानी करीब 57 प्रतिशत चार बड़े शहरों में हैं. वहीं, प्रदेश के 90 ब्लॉक ऐसे हैं जहां एक भी निजी अस्पताल योजना से संबद्ध नहीं है. ऐसे क्षेत्रों में अस्पतालों के लिए नियमों में कुछ छूट दिए जाने की तैयारी है.

अस्पताल संचालकों ने लागत को लेकर जताई नाराजगी

निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि एनएबीएच प्रमाणन की प्रक्रिया काफी महंगी है. इसके लिए करीब पांच लाख रुपये की फीस के अलावा निरीक्षण टीम के आने-जाने और ठहरने का खर्च भी अस्पताल को उठाना पड़ता है.

एनएबीएच के मानकों को पूरा करने के लिए स्टाफ, रिकॉर्ड, उपकरण और बेड की संख्या जैसी व्यवस्थाएं भी बढ़ानी पड़ती हैं. अस्पताल संचालकों के मुताबिक करीब 50 बेड वाले अस्पताल पर इन सभी व्यवस्थाओं में सालाना लगभग 40 लाख रुपये तक खर्च हो सकता है.

आयुष्मान पैकेज की दरों पर भी सवाल

अस्पताल संचालकों का दावा है कि कोरोना के बाद इलाज से जुड़ी कई चीजों की लागत करीब 25 प्रतिशत बढ़ चुकी है, जबकि आयुष्मान पैकेज की दरें नहीं बढ़ाई गईं. कुछ सेवाओं के भुगतान में कमी भी हुई है.

उदाहरण के तौर पर डायलिसिस के एक साइकिल के लिए पहले 2250 रुपये मिलते थे. अब एनएबीएच अस्पताल को 1485 रुपये और गैर-एनएबीएच अस्पताल को 1350 रुपये दिए जा रहे हैं. अस्पतालों को भुगतान में तीन से चार महीने तक की देरी होने की बात भी संचालकों ने कही है.

नर्सिंग होम एसोसिएशन ने यह सवाल भी उठाया है कि एनएबीएच की अनिवार्यता सिर्फ चार शहरों में क्यों लागू की जा रही है. एसोसिएशन का सुझाव है कि गुणवत्ता सुधारने के लिए क्यूसीआई-सीजीएचएस जैसे दूसरे प्रमाणन विकल्पों को भी मान्यता दी जानी चाहिए.

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