डिंडोरी /शैलेश नामदेव /खबर डिजिटल/ डिंडौरी के जनपद मुख्यालय करजिया में लंबे समय से अवैध रूप से संचालित झोलाछाप क्लिनिक पर आखिरकार प्रशासन ने सख्त कार्रवाई की है। मंगलवार को स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम ने झोलाछाप डॉक्टर पारेश सिकदार के क्लिनिक को सील कर दिया। यह कार्रवाई उस विवाद के बाद सामने आई, जिसमें पारेश सिकदार की वरिष्ठ भाजपा नेता एवं प्रतिष्ठित व्यापारी से मारपीट की घटना प्रकाश में आई थी।
जानकारी के अनुसार, विवाद की जड़ हेडपंप हटाने को लेकर हुई कहासुनी बताई जा रही है। इसी विवाद ने बाद में हिंसक रूप ले लिया, जिसके बाद मामला सार्वजनिक हुआ और प्रशासनिक महकमे पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा। गौरतलब है कि पारेश सिकदार पर आरोप है कि वह बिना वैध चिकित्सा डिग्री के वर्षों से अवैध रूप से क्लिनिक संचालित कर रहा था और मरीजों को भर्ती कर इलाज भी करता था।
फर्जी और अवैध क्लिनिकों के खिलाफ अभियान चलाने की मांग
स्थानीय लोगों और व्यापारियों का कहना है कि झोलाछाप डॉक्टर के खिलाफ पहले भी कई बार शिकायतें की गई थीं, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के चलते कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। आरोप है कि जिले में झोलाछाप डॉक्टरों का एक संगठित गिरोह सक्रिय है, जो अवैध क्लिनिकों को संरक्षण देने के साथ-साथ कार्रवाई से बचाने का काम करता रहा है।
घटना के बाद स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश देखा गया। लोगों ने कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपकर जिलेभर में संचालित फर्जी और अवैध क्लिनिकों के खिलाफ अभियान चलाने की मांग की। नागरिकों का कहना है कि ऐसे झोलाछाप डॉक्टर गरीब और भोली-भाली जनता की जान से खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं।
झोलाछापों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई के निर्देश
सूत्रों के मुताबिक, कुछ दिन पहले कलेक्टर द्वारा झोलाछापों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए थे, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के ब्लॉक और जिला स्तर के अधिकारियों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। विवाद और मारपीट की घटना के बाद जब मामला तूल पकड़ने लगा, तब प्रशासन हरकत में आया और क्लिनिक को सील किया गया।
प्रशासन का कहना है कि मामले की विस्तृत जांच की जा रही है और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वहीं स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में इस तरह के अवैध क्लिनिक दोबारा खुले या दोषियों को संरक्षण मिला, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।
यह पूरा मामला न केवल झोलाछाप डॉक्टरों की सक्रियता को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़े करता है कि आखिर स्पष्ट शिकायतों के बावजूद कार्रवाई विवाद और जनदबाव के बाद ही क्यों होती है।


