Sunday, November 1, 2026
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कान्हीवाड़ा पशु चिकित्सालय बना लापरवाही का अड्डा: डॉक्टर साहिबान सिर्फ अटेंडेंस लगाकर गायब, गरीब पशुपालक परेशान

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोलती एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। यहाँ के कान्हीवाड़ा पशु चिकित्सालय में पदस्थ जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी अपनी ड्यूटी के प्रति पूरी तरह लापरवाह बने हुए हैं। आलम यह है कि दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों से अपने बीमार पशुओं को लेकर आने वाले पशुपालक इलाज के अभाव में भारी परेशानियां झेलने को मजबूर हैं, लेकिन जिम्मेदारों पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है।

शासकीय नियमानुसार पशु चिकित्सालय के खुलने और बंद होने का समय सुबह 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक निर्धारित किया गया है। इसके बावजूद कान्हीवाड़ा अस्पताल के कर्मचारी अपनी मर्जी के मालिक बने हुए हैं। जानकारी के मुताबिक, इस अस्पताल में कुल 4 कर्मचारी पदस्थ हैं, जिनमें डॉक्टर और अन्य अमला शामिल है। इसके बावजूद या तो अस्पताल पर हमेशा ताला लटका रहता है या फिर जिम्मेदार नदारद मिलते हैं।

सूत्रों और जमीनी पड़ताल से यह बड़ा खुलासा हुआ है कि अस्पताल में पदस्थ कर्मचारी महज कागजी खानापूर्ति करने आते हैं।
आरोप है कि ये कर्मचारी सुबह अस्पताल पहुंचकर केवल अटेंडेंस रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर करते हैं और इसके बाद गायब हो जाते हैं।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, श्री पीतांबर इनवाती (V.A.S) सिर्फ अपने हस्ताक्षर करने आते हैं और इसके बाद नदारद हो जाते हैं। वहीं श्री कृष्ण राव पाटिल (A.V.F.O)साहब भी अटेंडेंस लगाने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में घूम-घूमकर प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं।
ग्रामीण इलाकों में पशुओं का प्राइवेट इलाज कर ये लोग गरीब पशुपालकों से मोटी रकम वसूल रहे हैं, जिसमें कथित तौर पर सरकारी दवाइयों का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।

सरकारी तनख्वाह लेने वाले ये जिम्मेदार डॉक्टर और कर्मचारी अस्पताल को अपनी बपौती समझ बैठे हैं। एक तरफ गरीब किसान पशुओं की बीमारी से परेशान है, तो दूसरी तरफ ये लोग प्राइवेट प्रैक्टिस कर जेबें भरने में लगे हैं। अधिकारियों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

जब इस पूरे गंभीर मामले पर हमारे संवाददाता ने जिले के जिम्मेदार और सक्षम अधिकारियों से उनका पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने कैमरे के सामने आने से साफ इनकार कर दिया और सवालों से बचते नजर आए। इससे साफ जाहिर होता है कि इस अवैध खेल में कहीं न कहीं उच्च अधिकारियों की भी मौन सहमति या शह प्राप्त है, जिसके चलते इन लापरवाह कर्मचारियों के हौसले बुलंद हैं।

अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद जिला प्रशासन और पशुपालन विभाग के उच्च अधिकारी इस मामले में क्या कड़ा कदम उठाते हैं, या फिर यह मामला भी फाइलों में ही दबता रह जाएगा।

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