Monday, November 2, 2026
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पत्थरों में इतिहास, लोककथा में कृष्ण… बांधा-इमलाज बना ‘लघु वृंदावन’ जन्माष्टमी पर आज होंगे भव्य आयोजन

खबर डिजिटल न्यूज़ कटनी– बारिश की रिमझिम फुहारें, मंदिर परिसर में गूंजते भजन और आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की झांकी… रीठी विकासखंड के बिलहरी के समीप स्थित बांधा-इमलाज का श्रीराधा-कृष्ण मंदिर जन्माष्टमी पर कुछ ऐसा ही आध्यात्मिक रंग बिखेरता है। करीब एक सदी पुराना यह मंदिर क्षेत्र में ‘लघु वृंदावन धाम’ के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर की पहचान जितनी इसकी भव्य पत्थर की नक्काशी से है, उतनी ही करीब सौ वर्ष पुरानी उस लोककथा से भी है, जिसमें लगातार बारिश के बीच तीन दिन तक कृष्ण की बांसुरी की धुन सुनाई देने की बात कही जाती है।सात दिन बारिश… तीन दिन सुनाई दी बांसुरीस्थानीय बुजुर्गों के अनुसार भगवान श्रीराधा-कृष्ण की प्राण-प्रतिष्ठा के कुछ वर्ष बाद भाद्रपद मास में लगातार सात दिनों तक मूसलाधार बारिश हुई थी। इसी दौरान तीन दिनों तक मंदिर परिसर से भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन सुनाई देने की बात कही जाती है।इस घटना की चर्चा पीढ़ियों तक होती रही। कृष्ण की बांसुरी से जुड़ी इसी लोकमान्यता ने मंदिर को ‘लघु वृंदावन’ की पहचान दे दी। आज भी दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु इस मंदिर को विशेष आस्था की दृष्टि से देखते हैं।1915 में शुरू हुआ निर्माण, 1924 में हुआ पूरामंदिर के इतिहास के अनुसार मालगुजार परिवार के गोरेलाल पाठक ने वर्ष 1915 में भूमिपूजन कराकर मंदिर निर्माण शुरू कराया था। निर्माण के दौरान ही उनका निधन हो गया। इसके बाद उनकी दोनों पत्नियों ने निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया और वर्ष 1924 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। वर्ष 1926 में भगवान श्रीराधा-कृष्ण की प्राण-प्रतिष्ठा विधि-विधान से कराई गई।बताया जाता है कि मंदिर निर्माण में उस समय करीब 15 हजार रुपये खर्च हुए थे। इसके अलावा 11 वर्ष की मालगुजारी में प्राप्त अनाज का उपयोग भी निर्माण कार्य में किया गया था।सैदा के पत्थरों को बिलहरी के कारीगरों ने दिया आकारमंदिर की स्थापत्य कला आज भी लोगों को आकर्षित करती है। इसके निर्माण में रीठी तहसील के सैदा गांव से निकाले गए पत्थरों का उपयोग किया गया था। इन पत्थरों को बिलहरी के कुशल कारीगरों ने तराशकर मंदिर का स्वरूप दिया।पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी, बेल-बूटों की कलाकृतियां और भगवान श्रीराधा-कृष्ण की मनोहारी झांकी मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगाती है। समय बीतने के बावजूद पुरानी कारीगरी आज भी मंदिर की खास पहचान बनी हुई है।भूरा-चंदुआ से जुड़ी है एक और कथामंदिर निर्माण से जुड़ी एक अन्य लोककथा भी क्षेत्र में प्रचलित है। बताया जाता है कि निर्माण के लिए पत्थरों को बैलगाड़ी से लाया जाता था। इस काम में भूरा और चंदुआ नाम के दो बैल लगाए जाते थे।स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराधा-कृष्ण की प्राण-प्रतिष्ठा के यज्ञ के समापन के दिन दोनों बैलों ने मंदिर में भगवान के सामने ही प्राण त्याग दिए थे। मंदिर से जुड़ी यह कथा आज भी स्थानीय लोगों के बीच सुनाई जाती है।आज आधी रात को होगा कृष्ण जन्मलघु वृंदावन धाम बांधा-इमलाज में आज जन्माष्टमी का पर्व भव्यता के साथ मनाया जाएगा। सुबह 8 बजे भगवान का अभिषेक एवं पूजन होगा। दोपहर 12 बजे से उमेश रजक के हरि ओम म्यूजिकल आर्केस्ट्रा ग्रुप और बिलहरी के भजन कलाकारों द्वारा भजनों की प्रस्तुति दी जाएगी।शाम 7 बजे से सचिन समदरिया के संयोजन में जय मां आसमानी रामचरितमानस मंडल, देवरी हटाई के भजन कलाकार धार्मिक प्रस्तुतियां देंगे।रात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण की जन्म झांकी निकाली जाएगी। आतिशबाजी और महाआरती के साथ कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाएगा। इस दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी रहने की संभावना है।सालभर चलता है धार्मिक आयोजनों का सिलसिलालघु वृंदावन धाम में केवल जन्माष्टमी ही नहीं, बल्कि पूरे वर्ष धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। प्रत्येक पूर्णिमा पर महाआरती के साथ राधाष्टमी, महाशिवरात्रि, शरद महोत्सव, अन्नकूट पर्व पर महादीपदान और नववर्ष समारोह आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा कथा-प्रवचन और अन्य धार्मिक कार्यक्रम भी चलते रहते हैं।लोककथा ने दी अलग पहचानकरीब सौ वर्ष पुराने इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी आस्था और इतिहास का मेल है। एक ओर पत्थरों पर उकेरी गई पुरानी कारीगरी इसकी ऐतिहासिक विरासत को संजोए है, तो दूसरी ओर कृष्ण की बांसुरी से जुड़ी लोककथा इसे धार्मिक आस्था में विशेष स्थान देती है। यही वजह है कि बांधा-इमलाज का यह मंदिर आज भी क्षेत्र में ‘लघु वृंदावन’ के नाम से अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।

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