मध्य प्रदेश में हेपेटाइटिस बी और सी के मामले लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश का लगभग हर 12वां व्यक्ति किसी न किसी रूप में इस संक्रमण से प्रभावित है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अधिकांश मरीजों को लंबे समय तक बीमारी का पता ही नहीं चल पाता. ऐसे में संक्रमण धीरे-धीरे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है और जब तक इसकी पहचान होती है, तब तक स्थिति गंभीर हो सकती है.
शुरुआती दौर में नहीं दिखते कोई खास लक्षण
विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस बी और सी वायरस बहुत धीरे-धीरे असर करते हैं. शुरुआती चरण में करीब 95 प्रतिशत मरीजों में किसी तरह के स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. कई लोगों को तब बीमारी का पता चलता है, जब पीलिया, लगातार थकान, भूख कम लगना, पेट में सूजन या पानी भरने जैसी समस्याएं सामने आने लगती हैं. कई मामलों में तब तक संक्रमण लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर जैसी गंभीर स्थिति तक पहुंच चुका होता है.
टीकाकरण में अब भी बड़ी चुनौती
हेपेटाइटिस बी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका समय पर टीकाकरण माना जाता है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में 12 से 23 महीने की आयु वाले लगभग 81.5 प्रतिशत बच्चों को ही हेपेटाइटिस बी का पूरा टीकाकरण मिल पाया है. इसका मतलब है कि हर पांचवां बच्चा अब भी इस संक्रमण के खतरे के दायरे में है. विशेषज्ञों का मानना है कि नवजात शिशुओं को जन्म के 24 घंटे के भीतर हेपेटाइटिस बी की पहली डोज देने से संक्रमण का जोखिम लगभग 90 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है.
जांच में सामने आ रहे संक्रमण के मामले
ब्लड बैंकों में होने वाली नियमित स्क्रीनिंग भी इस बीमारी की गंभीरता की ओर इशारा कर रही है. भोपाल के सरकारी ब्लड बैंक में अब तक 3900 लोगों में हेपेटाइटिस बी और 390 लोगों में हेपेटाइटिस सी संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल जांच कराने वाले लोगों का आंकड़ा है, जबकि वास्तविक संक्रमितों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है.
इन कारणों से बढ़ रहा संक्रमण
डॉक्टरों के अनुसार समय पर जांच नहीं कराना, नवजात बच्चों का टीकाकरण छूट जाना, संक्रमित सुई का इस्तेमाल, बिना जांचे रक्त का चढ़ाया जाना, दंत चिकित्सा उपकरणों का सही तरीके से स्टरलाइज न होना और असुरक्षित तरीके से टैटू बनवाना संक्रमण फैलने के प्रमुख कारण हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस सी का इलाज अब आधुनिक दवाओं से तीन से छह महीने के भीतर संभव है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि संक्रमण की समय रहते पहचान हो जाए. इसलिए नियमित जांच, सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग और समय पर टीकाकरण ही इस गंभीर बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है.
