Monday, November 2, 2026
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Supreme Court Verdict: पिता की मौत के बाद शादीशुदा बेटी को भी मिलेगी सरकारी नौकरी, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. अदालत ने कहा कि यदि किसी राज्य की नीति में केवल तलाकशुदा या पति से अलग रह रही बेटियों को ही अनुकंपा नियुक्ति का पात्र माना गया है, तो ऐसा प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है.

पटना हाई कोर्ट के फैसले को किया निरस्त

यह मामला बिहार की सायरा खातून और उनकी बेटी से जुड़ा था. पिता की मृत्यु के बाद बेटी ने अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी, लेकिन बिहार सरकार ने राज्य की नीति का हवाला देकर आवेदन अस्वीकार कर दिया. बाद में पटना हाई कोर्ट ने भी सरकार के फैसले को सही माना. अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है.

बेटा और बेटी दोनों समान अधिकार रखते हैं

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि संविधान बेटा और बेटी के बीच किसी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं करता. अदालत ने टिप्पणी की कि शादी के बाद बेटी का अपने मायके से रिश्ता समाप्त हो जाता है, ऐसी सोच कानून की नजर में सही नहीं मानी जा सकती. इसलिए केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना पूरी तरह अनुचित है.

भाई की आपत्ति को भी नहीं माना आधार

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि राज्य सरकार ने नियुक्ति से इनकार करने के पीछे मृतक कर्मचारी के भाई की आपत्ति का भी हवाला दिया था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि भाई पहले ही अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) दे चुका था. ऐसे में इस आधार पर आवेदन खारिज करना उचित नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि अब इस तर्क का कोई कानूनी महत्व नहीं रह जाता.

आठ सप्ताह में दोबारा निर्णय लेने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वह अपीलकर्ता के आवेदन पर नए सिरे से केवल उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करे. अदालत ने यह प्रक्रिया आदेश की प्रति मिलने के आठ सप्ताह के भीतर पूरी करने के लिए कहा है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में अत्यधिक तकनीकी आधार अपनाकर किसी पात्र व्यक्ति का अधिकार नहीं छीना जा सकता. यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां शादीशुदा बेटियों को केवल वैवाहिक स्थिति के कारण सरकारी नौकरी से वंचित किया गया है.

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