Sunday, November 1, 2026
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सपा-कांग्रेस का नया प्लान! सामान्य सीटों पर भी दलित युवाओं को कमान, 2027 से पहले बदलेगा सियासी समीकरण?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. भाजपा के बाद अब विपक्षी खेमे में भी सामाजिक समीकरणों को साधने की कवायद शुरू हो गई है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने दलित और पिछड़े वर्ग के युवाओं को संगठन में अहम जिम्मेदारियां देना शुरू किया है. खास बात यह है कि सामान्य विधानसभा सीटों पर भी दलित युवाओं को प्रभारी बनाया जा रहा है.

दोनों दलों की कोशिश ऐसे युवाओं को अपने साथ जोड़ने की है, जो समाजवादी और आंबेडकरवादी विचारधारा से प्रभावित हैं. इन युवाओं को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में संगठन मजबूत करने और नए लोगों को पार्टी से जोड़ने की जिम्मेदारी दी जा रही है.

सामान्य सीटों पर दलित युवाओं को जिम्मेदारी

समाजवादी पार्टी ने इस रणनीति के तहत कई सामान्य सीटों पर दलित युवाओं को विधानसभा प्रभारी बनाया है. ऊंचाहार में मनोज पासवान, बाबागंज में शिवशंकर सरोज और कौशांबी-फतेहपुर क्षेत्र में राम करन निर्मल को जिम्मेदारी दी गई है. वहीं मधुबन से विनीत कुशवाहा और कुशीनगर से राहुल राज को भी संगठनात्मक काम सौंपा गया है.

इन नेताओं को मुख्य रूप से युवाओं के बीच पहुंच बढ़ाने, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और पार्टी की विचारधारा को मजबूत करने का लक्ष्य दिया गया है. सपा की इस पहल को पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

कांग्रेस भी युवाओं पर लगा रही जोर

कांग्रेस ने भी विधानसभा स्तर पर युवाओं को सक्रिय करने की योजना बनाई है. पार्टी की ओर से बलिया में शैलेंद्र ध्रुव यादव, वेल्थरा रोड में मुरली मनोहर, बिलग्राम में सुभाष पाल और गौरा में तरुण पटेल को युवाओं के बीच संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है.

विपक्षी दलों की रणनीति केवल अपने पारंपरिक वोटरों को वापस जोड़ने तक सीमित नहीं है. उनकी नजर ऐसे युवाओं पर भी है जो किसी समय बसपा के साथ रहे हैं या मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से नाराज बताए जाते हैं.

BSP के पुराने ब्राह्मण समीकरण पर नजर

दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी भी 2027 के लिए अपने पुराने सामाजिक समीकरण को दोबारा मजबूत करने की कोशिश में जुटी है. मायावती की पार्टी की नजर एक बार फिर ब्राह्मण समाज पर है. हालांकि पिछले वर्षों में BSP के कई चर्चित ब्राह्मण नेता पार्टी से अलग हो चुके हैं. अंटू मिश्रा का निष्कासन इस सिलसिले की ताजा घटना माना जा रहा है.

2007 के फॉर्मूले की चर्चा फिर तेज

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में BSP ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. पार्टी ने 80 से अधिक ब्राह्मणों को टिकट दिया था, जिनमें 41 उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. इसी सामाजिक समीकरण ने BSP को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी.

अब 2027 से पहले सपा-कांग्रेस जहां दलित और पिछड़े युवाओं के जरिए पीडीए को मजबूत करने में जुटी हैं, वहीं BSP के सामने अपने पुराने ब्राह्मण आधार को फिर से साधने की चुनौती है. ऐसे में उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में सामाजिक समीकरण आने वाले दिनों में और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

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