बड़वानी/ खबर डिजिटल। नर्मदा नदी में विशाल नाव रैली निकालकर विस्थापित मछुआरों ने 10 प्रमुख मांगों को मध्यप्रदेश सरकार के सामने रखा। सोमवार को नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेतृत्व में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के सहयोग से नर्मदा घाटी के विस्थापित मछुआरों ने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की मांग को लेकर अनोखा प्रदर्शन किया। नर्मदा नदी में विशाल नाव रैली का उद्देश्य वर्षों से लंबित मछुआरा समुदाय की समस्याओं की ओर सरकार और प्रशासन का ध्यान आकर्षित करना था। इस नाव रैली और जल सत्याग्रह में बड़वानी, धार, खरगौन और अलीराजपुर जिलों के सैकड़ों मछुआरा परिवार शामिल हुए। आंदोलनकारियों का कहना है कि सरदार सरोवर परियोजना एक अंतरराज्यीय परियोजना है, इसलिए इससे जुड़े लाभ, हानि और पुनर्वास संबंधी सभी निर्णय नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले के अनुसार ही लागू किए जाने चाहिए।
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नाव रैली के दौरान मेधा पाटकर मछुआरों के साथ नाव में मौजूद रहीं । इसके बाद बड़वानी कलेक्टर को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित मछुआरों को नर्मदा ट्रिब्यूनल के निर्णय के अनुसार अधिकार देने की प्रमुख मांग की गई है। इसके अलावा, प्रस्तावित नर्मदा मत्स्य सहकारी उत्पादन एवं विपणन संघ के पंजीकरण, विस्थापित मछुआरों के पुनर्वास, आवास, आजीविका की व्यवस्था तथा मत्स्य व्यवसाय को ठेकेदारी प्रथा से मुक्त कर सहकारी समितियों को सौंपने जैसी अहम मांगें शामिल हैं।
आंदोलनकारियों की 10 प्रमुख मांगें
- जलाशय में बढ़ते प्रदूषण पर रोक, अवैध रेत खनन पर कड़ी कार्रवाई
- क्रूज संचालन से मछुआरों की आजीविका पर पड़ रहे प्रभाव का समाधान
- जलस्तर में गिरावट से मत्स्याखेट को हो रहे नुकसान पर ठोस कदम
- मछुआरों को किसान का दर्जा
- केसीसी कार्ड की सुविधा
- बंद अवधि में आर्थिक सहायता राशि में वृद्धि
- पुलिस-प्रशासन द्वारा कथित उत्पीड़न के मामलों में त्वरित कार्रवाई
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मेधा पाटकर ने दी चेतावनी
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि नर्मदा घाटी के मछुआरे विस्थापन के सबसे बड़े पीड़ित हैं, लेकिन दशकों बाद भी उन्हें उनके कानूनी अधिकार नहीं मिल पाए हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शासन-प्रशासन ने जल्द निर्णय नहीं लिया, तो आंदोलन को और अधिक व्यापक और उग्र किया जाएगा।
नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले की धारा XI, उपधारा V(8) के अनुसार सरदार सरोवर जलाशय में मत्स्य पालन का अधिकार राज्य शासन के पास है। इस संबंध में केंद्रीय कृषि मंत्रालय के मत्स्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात के मुख्य सचिवों को पूर्व में पत्र भी लिखा जा चुका है। इसके बावजूद मछुआरों को अब तक उनके वैधानिक अधिकार नहीं मिल पाए हैं।
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