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Friday, April 17, 2026
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चिचरिंगपुर से भोपाल तक का सफर, सोशल मीडिया को बनाया हथियार और अब फिल्म जगत में लहराया डिंडोरी का परचम

डिंडोरी के जंगलों से भोपाल फिल्म फेस्टिवल तक: दो आदिवासी युवाओं के संघर्ष और सफलता की अनकही कहानी

शैलेश नामदेव/डिंडोरी/खबर डिजिटल/ डिंडोरी, जिले के सुदूर और जंगली आदिवासी इलाका के छोटे से गांव चिचरिंगपुर से निकलकर सतपाल सत्या परधान ने वह स्थान हासिल किया है, जो लाखों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। एक साधारण मजदूर मां के बेटे सत्या परधान की पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म “GUDUM – A Folk Drum” (गुदुम – ए फॉक ड्रम), तो वहीं उमा वलाड़ी जो सुंदरपुर (समनापुर) से हैं और डिंडौरी की महिला डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर हैं उनकी फिल्म “Gond Chitrakala” (गोंड चित्रकला) का चयन प्रतिष्ठित “द भोपाल फिल्म फेस्टिवल” के फाइनल शो के लिए किया गया है।
यह उपलब्धि न केवल सत्या परधान और उमा वलाड़ी की व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि पूरे डिंडोरी ज़िले और क्षेत्रीय संस्कृति के लिए गर्व का विषय भी है।
ग्राम चिचरिंगपुर जैसे इलाके में, जहां आज भी नेटवर्क और तकनीकी सुविधाओं का भारी आभाव है वहां रहकर फिल्म निर्माण जैसे क्षेत्र में कदम रखना आसान नहीं था। बावजूद इसके, सत्या परधान ने विपरीत परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया और लगातार मेहनत करते रहे।पारंपरिक अपने वाद्ययंत्र गुडुम के साथ बनायें गये उनके रील्स खासे लोकप्रिय और चर्चित रहे यहीं से उनकी सिनेमाई सफर की शुरूआत हुई। उमा वलाड़ी कहती है कि महिला फिल्ममेकर बनना अपने आप में एक चुनौती है।
सत्या ने सोशल मीडिया को अपनी आवाज़ बनाया। इंस्टाग्राम पेज @dindori_trend के माध्यम से वे डिंडोरी जिले की लोक संस्कृति, परंपराएं, जीवनशैली और अनसुनी कहानियों को रील्स और शॉर्ट फिल्मों के ज़रिए लोगों तक पहुंचाते रहे। इसी निरंतर प्रयास ने उन्हें डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण तक पहुंचाया।

लोक संस्कृति पर केंद्रित फिल्म

उनकी चयनित डॉक्यूमेंट्री “GUDUM – A Folk Drum” आदिवासी अंचल की पारंपरिक लोक वाद्य संस्कृति पर आधारित है, जो न केवल कला को दर्शाती है बल्कि उस समाज के संघर्ष, पहचान और आत्मसम्मान की कहानी भी कहती है।
सत्या परधान का कहना है कि यह उपलब्धि उनके सफर की शुरुआत है। वे भविष्य में एक सशक्त फिल्मकार बनकर अपनी मिट्टी, संस्कृति और कहानियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले जाना चाहते हैं। उनका लक्ष्य है कि उनकी सफलता उनके माता-पिता , गांव और पूरे डिंडोरी ज़िले का नाम रोशन करे।


सतपाल सत्या परधान की सफलता यह साबित करती है कि संसाधनों की कमी कभी भी सपनों की उड़ान को रोक नहीं सकती, अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत सच्ची हो तो हर मुकाम को हासिल किया जा सकता है। वही उमा वलाड़ी का कहना है कि traditional knowledge को फ़िल्म के जरिए डॉक्यूमेंट करना चाहती हूं, जिससे समुदाय की बात, कहानी-किस्से फिल्म के माध्यम से जीवित रहे और आने वाले पीढ़ी तक वो knowledge ट्रांसफर हो सके । मेरा यह मानना है कि फिल्म एक महत्वपूर्ण जरिए है जिससे हम लोगों के कल्चर की बात बहुत लोगों तक पहुंचा सकते हैं।
सतपाल सत्या की कहानी उन तमाम युवकों के लिए एक मिसाल है जो संसाधनों की कमी को अपनी सफलता का रोड़ा मानते हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत हो तो किसी भी मंजिल को प्राप्त किया जा सकता है।

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