भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मूल पहचान एक यह भी है कि वो अलग-अलग राज्यों में वहां की पृष्ठभूमि के अनुसार काम करता है, चाहे वो अपनी कार्यशैली के अनुसार अलग-अलग नगरों का निर्माण या फिर संगठन के अनुसार जिलों का नाम, इन सभी में स्थानीय पृष्ठभूमि को तरजीह दी जाती है, इसी तरह से राज्य स्तर पर भी अलग-अलग प्रांतीय व्यवस्था के अनुसार संघ काम करता है, जैसे कि मध्यप्रदेश में तीन मालवा, मध्यभारत की प्रांतीय व्यवस्था लागू की गई है, लेकिन अब संघ सरकारी मशीनरी की तरह काम करने की तरफ जाता दिखाई दे रहा है, सूत्रों की माने तो अब संभागीय व्यवस्था से इसकी शुरुआत हो जाएगी।
अभा प्रतिनिधि सभा में लग सकती है मुहर
मार्च में संघ की हरियाणा के बालसखा में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक संपन्न होगी, इस बैठक में कई बदलावों पर मंथन किया जा सकता है। इसमें प्रांतीय व्यवस्था को समाप्त कर संभागीय व्यवस्था का तानाबाना बुना जा सकता है। वह है अब प्रांत प्रचारक की भूमिका को समाप्त कर सरकारी तंत्र की तरह संभागीय प्रचारक बनाए जा सकते हैं, जिसे संघ में उसी तरह के बड़े बदलाव के रुप में देखा जा रहा है, जिस तरह से हाफ नेकर को बदलकर फुल पेंट लागू कर दी गई थी।
संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने पर बदलावों की बयार
बता दें कि आरएसएस के 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं, ऐसे में काम और विचार को जमीनी स्तर तक ले जाने के लिए संघ बड़े बदलावों की तरफ आगे बढ़ रहा है, इसमें संगठन स्तर पर बड़े बदलावों की तरफ आगे बढ़ा जा रहा है। इसके लिए मौजूदा प्रांतीय व्यवस्था को समाप्त कर सिर्फ प्रदेश स्तर पर एक राज्य प्रचारक बनाया जा सकता है। साथ ही विभाग और राज्य के बीच में एक संभागीय व्यवस्था लागू की जा सकती है। जिसका फैसला आगामी संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में होने की संभावना जताई जा रही है।
मध्यप्रदेश में बनेंगे 6 से 8 संभाग प्रचारक
सरकारी मशीनरी में संभाग स्तर पर संभागायुक्त होता है, ठीक इसी तरह से संघ में भी संभाग स्तर पर संभाग प्रचारक की भूमिका तय की जा सकती है। कुछ छोटे संभागों जैसे आलीराजपुर और मुरैना को पड़ोसी संभागों में रखा जा सकता है। संभागीय स्तर पर एक पूरी कार्यकारिणी रह सकती है, जिसमें करीब 40 पदाधिकारियों के रहने की संभावना है। एमपी में भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा, सागर, खंडवा और नर्मदापुरम संभागीय व्यवस्था के केंद्र रह सकते हैं, और जो भी जिम्मेदारी प्रांत प्रचारकों की है, उसका निर्वहन संभागीय प्रचारक करेंगे।
बीजेपी पर क्या पड़ेगा नई व्यवस्था का प्रभाव
मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों में बीजेपी ने संगठन महामंत्रियों की नियुक्तियों को काफी कम कर दिया है, जिस तरह से पहले जिला संगठन महामंत्री की व्यवस्था को समाप्त किया गया, उसके बाद अब प्रदेश संगठन महामंत्रियों के खाली पदों की जिम्मेदारी को क्षेत्रीय संगठन महामंत्री के हाथों में दिया जा रहा है। ऐसे में तर्क दिया जा रहा था कि संघ में प्रचारकों की कमी है, लेकिन अब संभाग और राज्य प्रचारकों की तैनाती होने के बाद यह मिथक समाप्त हो जाएगा, और पूरी तरह से बीजेपी पर संघ की पैनी निगाह रहेगी, साथ ही कामकाज को निचले स्तर पर ले जाने के लिए संघ एक-एक बार फिर घर-घर पहुंचने के लिए तैयार रहेगा।
