नावेद रज़ा/खबर डिजिटल/आज मुस्लिम समाज का 26 वा रोजा व 27 शब यानी रात है जिसे मुस्लिम समाज शब ए कद्र के रुप में मनाता है।
रमजान माह के अंतिम अशरे में आने वाली शबे क़द्र की रात को इस्लाम में बेहद मुबारक और बरकत वाली रात माना जाता है। धार्मिक जानकारों के अनुसार इस रात की फ़ज़ीलत और अजमत इतनी अधिक है कि इसे बयान करना आसान नहीं है। कुरआन शरीफ में भी इस रात की महानता का जिक्र मिलता है और बताया गया है कि यह रात हजार महीनों से बेहतर है। इस कारण मुसलमान इस रात में जागकर नमाज़, कुरआन की तिलावत, ज़िक्र-अज़कार, दुरूद शरीफ और नवाफिल अदा करते हैं।
उलेमाओं ने बताया कि क़द्र की रात में विभिन्न नफ़्ल नमाज़ अदा करने का विशेष महत्व बताया गया है। इसमें चार रकअत नफ़्ल नमाज़ एक सलाम से पढ़ने का जिक्र है, जिसमें हर रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह क़द्र (इन्ना अन्ज़लना) तीन बार और सूरह इख़लास पचास बार पढ़ी जाती है। नमाज़ पूरी होने के बाद तस्बीह पढ़कर अल्लाह से दुआ मांगी जाती है। इस दौरान “सुब्हानल्लाहि वल्हम्दुलिल्लाहि वला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर” की तस्बीह पढ़ने की सलाह दी गई है।
इसके अलावा दो रकअत नफ़्ल नमाज़ अदा करने का भी उल्लेख मिलता है। इसमें हर रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह क़द्र एक बार और सूरह इख़लास बीस बार पढ़ी जाती है। नमाज़ के बाद पांच सौ बार “कुल हुवल्लाहु अहद”, सौ बार “अस्तग़फ़िरुल्लाह रब्बी मिन कुल्ली ज़म्बिन व अतूबु इलैह” और सौ बार दुरूद शरीफ पढ़कर दुआ मांगने की बात कही गई है।
इसी तरह दो-दो रकअत की नियत से सौ रकअत नफ़्ल नमाज़ अदा करने का भी जिक्र है, जिसमें हर रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद एक बार सूरह क़द्र और तीन बार सूरह इख़लास पढ़ी जाती है। हर दो रकअत के बाद सलाम फेरने के बाद दस बार दुरूद शरीफ पढ़ने की हिदायत दी गई है।
उलेमाओं ने यह भी बताया कि शबे क़द्र की रात में वह खास दुआ भी पढ़नी चाहिए जो पैगंबर हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका (रज़ियल्लाहु तआला अन्हा) को सिखाई थी। यह दुआ है —“अल्लाहुम्मा इन्नका अफुव्वुन तुहिब्बुल अफ्वा फ़अफ़ु अन्नी या ग़फूर।”
इसके अलावा सलातुत तस्बीह नमाज़ को भी बेहद फ़ज़ीलत वाला अमल बताया गया है। बताया गया कि इस नमाज़ को किसी भी समय पढ़ा जा सकता है, केवल मकरूह वक्त में नहीं। हदीसों के अनुसार इसे रोजाना, सप्ताह में, महीने में या साल में एक बार, और अगर संभव न हो तो जीवन में कम से कम एक बार जरूर अदा करना चाहिए।
सलातुत तस्बीह की चार रकअत नमाज़ में हर रकअत में कुल 75 बार तस्बीह पढ़ी जाती है। इसमें सना पढ़ने के बाद 15 बार तस्बीह, फिर क़िरात के बाद 10 बार, रुकूअ में 10 बार, रुकूअ से खड़े होने के बाद 10 बार, पहले सज्दे में 10 बार, दोनों सज्दों के बीच 10 बार और दूसरे सज्दे में 10 बार तस्बीह पढ़ी जाती है। इस तरह हर रकअत में 75 बार और चार रकअत में कुल 300 बार तस्बीह पढ़ी जाती है।
उलेमाओं ने बताया कि शबे क़द्र की रात में मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा इबादत, कुरआन की तिलावत, तस्बीह, दुरूद शरीफ और दुआ में मशगूल रहना चाहिए, ताकि अल्लाह की रहमत और मगफिरत हासिल हो सके।


