Wednesday, November 4, 2026
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Mother’s Day पर पढ़े दिल की बात – चिथड़े में लिपटी माँ को भी याद कर लें…

Mother’s Day 2026:

Mother’s Day 2026: अपने हाथों से दही-शक्कर खिलाकर कामयाबी की कामना करती माँ, अपने बच्चों की बलाएँ उतराती माँ और देहरी लाँघ कर जाते बच्चे को अपने आँचल में बँधा मुड़ा-तुड़ा दस का नोट देकर पूरी दुनिया खरीद लेने की ताकत देती माँ को इस बदलते समय ने बाजार बना दिया है। हमारी सनातन संस्कृति में ‘मदर्स डे’ जैसा कोई कांसेप्ट कभी था ही नहीं। शाम ढले जब थका-हारा बच्चा घर लौटता और दुलार के साथ माँ की गोदी में सिर रखकर जन्नत का अहसास करने लगता उसी समय ‘मदर्स डे’ हो जाता था।

भागते-दौड़ते समय में यह पल-छीन, बाजार ने छीन लिया है। ‘मदर्स डे’ का मतलब बता दिया है कि माँ के लिए एक महँगा तोहफा खरीद कर उसे दो, सेल्फी लो और दुनिया को बता दो कि तुम अमीर नहीं, माँ गरीब हो गई है। वो दस रूपये का मुड़ा-तुड़ा नोट जो तुम्हें इस बाजार को खरीद लेने की ताकत देता था, वह पूँजी हम सबने गँवा दी है। हम सब फिर एक बार ‘मदर्स डे’ मनाने के लिए उतावले हो रहे हैं।

‘मदर्स डे’ क्या होता है, यह समझाने के लिए बाजार सज गया है। हम बाजार के बहकावे में आ गए हैं। दही-शक्कर खिलाती माँ और अपने भीतर के दर्द को समेटकर हर बार बच्चे की मुस्कराहट पर निसार होती माँ अब ‘मदर्स डे’ में सिमट गई है। आए दिन खबरें पढ़ते हैं कि एक बेटे ने माँ को इसलिए मौत के घाट उतार दिया कि उसने मोबाइल के लिए पैसे नहीं दिए या कि उसकी अनाप-शनाप जरूरतों को पूरा करने के लिए माँ की गाँठ में पैसे नहीं थे।

एक पुरानी कहानी इस संदर्भ में स्मरण हो आता है कि एक बार एक बेटे ने गुस्से में कुल्हाड़ी से माँ की गर्दन उड़ा दी। कटी हुई गर्दन ने शिकायत करने के बजाय पूछा-बेटा ऐसा करते हुए तुझे चोट तो नहीं लगी। ये है हमारा ‘मदर्स डे’ और कौन सा बाजार इस ‘दिल’ को बेच पाएगा और कौन सी औलाद है जो इसे खरीद पाएगी।


हम ‘मदर्स डे’ नहीं मनाते हैं बल्कि माँ की त्याग और उत्सर्ग को याद करने के लिए कभी वीरांगना लक्ष्मीबाई का स्मरण कर लेते हैं तो कभी ‘मदर इंडिया’ देख लेते हैं। माँ बच्चे की पहली पाठशाला होती है। उसे नैतिक शिक्षा देती है और संबंधों का मूल्य समझाती है और जब वह ऐसे में खुद को विफल होता देखती है तो ‘मदर इंडिया’ हो जाती है। पुरानी बात क्या कहें, एक दशक पहले टीकमढ़ में एक सरपंच माँ ने अपने ही बेटे को गाँव निकाला दे दिया कि नियम के खिलाफ जाकर उसने शराब पीने की जुर्रत की थी। माँ का दुलार और उसकी सख्ती से मिलकर हमारे सनातनी समाज का ‘मदर्स डे’ मनता है।

बाजार ने ‘मदर्स डे’ पर अपना कारोबार खड़ा कर लिया है लेकिन आज भी सैकड़ों मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार हैं जिनकेे लिए भगवान से पहले माँ है। ये परिवार एक दिन का ‘मदर्स डे’ नहीं मनाते हैं, इनके लिए हर पल छीन ‘मदर्स डे’ होता है। मैं ऐेसे कई अनुभव का साक्षी हूँ। एक बड़े उत्सव के आयोजन में एक बड़े संपादक को आमंत्रित किया और ऐनवक्त में उनकी ना हो गई। दुख हुआ और जब कारण पता चला कि माँ और पिता की तबीयत के चलते वो शामिल नहीं हो पा रहे हैं तो दुख कपूर की तरह उड़ गया। यहाँ एक बार फिर श्रवण कुमार याद आ गए। ऐसे भारतीय समाज में ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’ के बहाने बाजार की घुसपैठ आतंकित करता है। डराता है कि हमारे बच्चे कभी श्रवण कुमार को जान पाएंगे कि नहीं?


बाजार का अपना चरित्र है और उसने देखा कि भारतीय चरित्र की बुनियाद को इस नकली दिनों के बहाने और कमजोर किया जा सकता है तो उसने साल में एकाध दर्जन ऐसे दिन खड़े कर दिए। हमेशा की तरह बाजार सज गया है। जिस माँ ने कभी स्कूल की देहरी तक नहीं पहुँच पायी, उसका औलाद उसे ‘आई लव यू ममा’ का लुभावना चमकदार महँगा कार्ड भेंट कर रहा है। माँ को समझ ही नहीं आता कि ये क्या है, उसका क्या करे? उसके लिए तो उपहार उसकी औलाद है जो कुछ पल के लिए उसकी गोद में लेट जाए और वह दुलार से उसके सिर पर हाथ फेरने लगे तो हर पल माँ का हो जाता है।

माँ समझ ही नहीं पा रही है कि ये ‘मदर्स डे’ होता क्या है? और औलाद के लिए माँ के पास वक्त नहीं, बाजार से खरीदे गए महँगे तोहफे हैं। हम कौन से समय में किस दुनिया मेंं खड़े हैं। कवियों ने शायरों ने माँ को ऐसा महिमामंडित किया कि बाप की औकात दिखा दी गई। क्या माँ और पिता के बिना हम अपनी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं। ऐसे में मशहूर जावेद अख़्तर एक सभा में बेबाकी से इस पर तल्ख शब्दों में ऐतराज जाहिर करते हैं तो लगता कि वे ‘मदर्स डे’ की औकात दिखा रहे हैं। बाजार को उसकी औकात बता रहे हैं।


भारत के 130 करोड़ से अधिक नागरिकों में बमुश्किल एक करोड़ भी नहीं होंगे जिसकी औलाद के पास ‘मदर्स डे’ मनाने की औकात हो। यहाँ यह भी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि अपनी आर्थिक हैसियत को दरकिनार कर वह महँगा तोहफा इसलिए खरीद रहा है कि चार लोग क्या कहेंगे? माँ के पैरों में जन्नत तलाश करने वाला बच्चा अपनी माँ से कब बड़ा हो गया? माँ की कमजोर होती आँख के लिए एक सुंदर सा चश्मा बनाने के लिए औलाद के पास पैसे नहीं है, पैसे नहीं है माँ की दवा लाने के लिए और पैसे हैं तो वक्त नहीं माँ के लिए। यह भी आज के ‘मदर्स डे’ का सबसे बड़ा सच है। बाजार ने बच्चों को निर्मम बना दिया है।


अभी एक तस्वीर मेरी नजरों से गुजरी जिसमें एक माँ अपने बच्चे को कमर में आँचल से लपेट कर किसी धन्ना सेठ के बच्चे की शादी में लाईट लेकर चली जा रही है। डीजे में नाचते, खुशियों में रुपये लुटाते इस समाज की नजर ना तो उस माँ पर गई और ना ही उस नन्हें बच्चे पर। माँ कभी गरीब नहीं होती है, यह तस्वीर इस बात की तस्दीक करती है। माँ अमीर होती है अपने संकल्प से, अपने मातृत्व से और वो अपनी औलाद को दुनिया का सबसे कामयाब आदमी बनते देखना चाहती है, भले ही उसे आधा पेट खाना मिले। शरीर पर चिथड़े की सूरत में बदलती साड़ी सही मायने में माँ को परिभाषित करती है। बाजार जिस दिन ये तमीज हमें सिखा जाएगा फिर किसी ‘मदर्स डे’ की जरूरत नहीं होगी।

लेखक प्रो. मनोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं

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