पटना /खबर डिजिटल/ अजीत रेनू / भागदौड़, ट्रैफिक और डेडलाइन की दुनिया से दूर बिहार में कुछ ऐसी जगहें हैं जहाँ कदम रखते ही घड़ी की सुइयाँ धीमी हो जाती हैं। यहाँ पत्थर इतिहास सुनाते हैं, हवा में शांति घुली है और मन खुद-ब-खुद ठहर जाता है। ये सिर्फ टूरिस्ट स्पॉट नहीं, ‘टाइम मशीन’ हैं।
वैशाली जिला इतिहास में दुनिया के पहले गणतंत्र (लिच्छवी गणराज्य)
वैशाली में आते ही लगता है कि लोकतंत्र की साँसें आज भी चल रही हैं। दुनिया का पहला गणतंत्र यहीं बना था, 600 ईसा पूर्व में। लिच्छवि राजाओं ने 7777 जनपदों को जोड़कर जो संसद बनाई, उसके अवशेष आज भी ‘राजा विशाल का गढ़’ में दिखते हैं। अभिषेक पुष्करणी तालाब के किनारे खड़े होकर लगता है कि अभी आम्रपाली नृत्य करके निकली है। भगवान महावीर का जन्म यहीं हुआ और बुद्ध ने अपना आखिरी उपदेश भी यहीं दिया। यहाँ की मिट्टी में वोट नहीं, ‘संवाद’ की ताकत दबी है। आम के बागों से गुजरती हवा आज भी ‘वज्जि संघ’ की कहानी कहती है।
गयाजी (गया) मोक्ष और ज्ञान की भूमि
बिहार का गयाजी मोक्ष और ज्ञान की भूमि के रूप में विश्व प्रसिद्ध है। यह शहर फल्गु नदी, जिसे निरंजना भी कहते हैं, के तट पर बसा है और इसे सनातन धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति और पिंडदान के लिए सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरण-चिन्ह देखकर समय थम जाता है। पिंडदान सिर्फ कर्मकांड नहीं, पीढ़ियों को जोड़ने वाला धागा है। मान्यता है कि यहाँ पिंडदान करने से 7 पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है, इसलिए इसे ‘मोक्ष की भूमि’ कहते हैं। मंगला गौरी शक्तिपीठ की सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त हर कदम पर श्रद्धा बढ़ती जाती है। पितृपक्ष में लाखों लोग आते हैं, पर घाट पर अजीब सी शांति पसरी रहती है। यहाँ आकर लगता है मौत अंत नहीं, एक पड़ाव है।
नालंदा विश्वविद्यालय खंडहर: 1600 साल पुराना ‘कैंपस’
नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर में जाते ही टाइम रुक जाता है। पाँचवी सदी में जब ऑक्सफोर्ड का नामोनिशान नहीं था, तब यहाँ 10,000 छात्र और 2,000 शिक्षक थे। टूटी ईंटों, लाल गलियारों और ध्यान-कक्षों में आज भी मंत्र गूंजते लगते हैं। पुस्तकालय की राख बनी ‘धर्मगंज’ के सामने खड़े होकर लगता है कि बख्तियार खिलजी अभी-अभी गया है। सर्दियों की सुबह जब कोहरा खंडहरों को लपेटे रहता है, तो यहाँ फोन का नेटवर्क चला जाता है पर मन का कनेक्शन जुड़ जाता है।
बोधगया का महाबोधि मंदिर: जहाँ बुद्ध को ‘ज्ञान’ मिला
बोधगया का महाबोधि मंदिर दूसरी ऐसी जगह है। वही पीपल का पेड़, जिसके नीचे सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बने। 2600 साल से यहाँ दीये जल रहे हैं। मंदिर में एंट्री करते ही दुनिया की आवाज बंद हो जाती है, सिर्फ घंटियों की टन-टन सुनाई देती है। बोधि वृक्ष के नीचे 5 मिनट आँख बंद करके बैठो तो लगता है साँसें गिनना भूल गए। पूर्णिमा की रात जब मंदिर 1 लाख दीयों से जगमगाता है, वो नजारा आँखों में बस जाता है।
राजगीर के गर्म कुंड: जहाँ राजाओं ने थकान मिटाई
राजगीर के गर्म कुंड में भी वक्त ठहर जाता है। मगध के राजा बिम्बिसार से लेकर भगवान महावीर तक यहाँ नहाए। ‘ब्रह्मकुंड’ का पानी 45 डिग्री पर 24 घंटे बहता है। पहाड़ों से घिरे इस कुंड में पैर डालते ही शरीर की सारी टेंशन भाप बनकर उड़ जाती है। रोपवे से विश्व शांति स्तूप जाकर ऊपर से राजगीर देखो तो लगता है 5वीं सदी BC में आ गए।
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व: बिहार का ‘जंगल बुक’
पश्चिम चंपारण का वाल्मीकि टाइगर रिजर्व बिहार का अपना ‘जंगल बुक’ है। यहाँ मोबाइल टावर नहीं, बाघ की दहाड़ है। गंडक नदी किनारे कैंप में रात बिताते वक्त झींगुर की आवाज, जुगनू की रोशनी और ऊपर तारों की चादर मिलती है। जंगल सफारी में जब बाघ 10 फीट दूर से निकलता है, तो 1 सेकंड 1 घंटे जैसा लगता है।
विक्रमशिला खंडहर, भागलपुर: नालंदा की ‘छोटी बहन’
भागलपुर का विक्रमशिला खंडहर नालंदा की छोटी बहन जैसा है। पाल वंश का बनाया ये विश्वविद्यालय तिब्बत का गुरु था। गंगा किनारे बैठकर खंडहर देखो तो लगता है नाव पर चढ़कर भिक्षु अभी तिब्बत पढ़ाने जाएंगे। सनसेट के टाइम पूरा स्तूप सुनहरा हो जाता है।
बिहार इसलिए ‘टाइम ट्रैवल’ कराता है क्योंकि यहाँ इतिहास जिंदा है। यहाँ पत्थर 2000 साल पुराने हैं, पर कहानियाँ कल की लगती हैं। वैशाली में लोकतंत्र की नींव है, गयाजी में मोक्ष का दरवाजा। मंदिर का घंटा हो या जंगल की खामोशी, दोनों थेरेपी जैसे हैं।इन जगहों पर फोन स्विच ऑफ कर ‘रील’ नहीं, ‘रीयल’ जिन्दगी जीने का अनुभव मिलता है। जब दिल्ली-मुंबई की रफ्तार थका दे, तो बिहार की इन जगहों पर जरुर घुमने जाएँ । यहाँ टाइम रुकता नहीं, आपको रोककर जिंदा कर देता है।
