खबर डिजिटल संवाददाता कटनी –जिले के ढीमरखेड़ा तहसील में सरकारी जमीन हड़पने का एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां वर्षों तक राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी कर सरकारी एवं पट्टे की भूमि को एक निजी संस्था के नाम दर्ज कर दिया गया। मामले का खुलासा होने के बाद अपर कलेक्टर कटनी ने बड़ा फैसला सुनाते हुए विवादित भूमि को दोबारा शासकीय मद में दर्ज करने के आदेश जारी कर दिए हैं।मामला ग्राम बम्हौरी, तहसील ढीमरखेड़ा की खसरा नंबर 143 एवं 164 की लगभग 4.49 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार खसरा नंबर 143 मूल रूप से मध्यप्रदेश शासन की “घास मद” भूमि थी, जबकि खसरा नंबर 164 शंकरलाल बैदा नामक व्यक्ति को शासकीय पट्टे पर दी गई थी। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि बिना सक्षम न्यायालय और बिना वैध आदेश के यह जमीन “स्प्रिचुअल रीजनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया” नामक संस्था के नाम चढ़ा दी गई।जांच में सामने आया कि वर्ष 2004 से लेकर 2019 तक रिकॉर्ड में लगातार बदलाव होते रहे, लेकिन किसी सक्षम आदेश, कलेक्टर अनुमति या वैध नामांतरण दस्तावेज का रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया। इतना ही नहीं, शासकीय पट्टे की भूमि होने के बावजूद उसके विक्रय की अनुमति का कोई प्रमाण तक नहीं मिला।अपर कलेक्टर के आदेश में साफ उल्लेख किया गया है कि संस्था द्वारा प्रस्तुत विक्रय पत्रों के बावजूद यह साबित नहीं हो पाया कि जमीन वैधानिक रूप से हस्तांतरित हुई थी। राजस्व अधिकारियों की लापरवाही और रिकॉर्ड में संदिग्ध एंट्रियों ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।मृत पट्टेदार शंकरलाल के पुत्र बसंत डुमार ने भी प्रशासन के सामने बयान दिया कि उनके पिता ने कभी भूमि का विक्रय नहीं किया। उन्होंने संस्था का नाम तत्काल हटाने की मांग की। दूसरी ओर संस्था के वकील ने स्वयं को “सद्भावी क्रेता” बताते हुए कार्रवाई निरस्त करने की मांग की, लेकिन प्रशासन ने इसे स्वीकार नहीं किया।पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सरकारी जमीन और पट्टे की भूमि निजी संस्था के नाम कैसे चढ़ गई? क्या यह सिर्फ राजस्व कर्मचारियों की लापरवाही थी या फिर जमीन माफियाओं और प्रशासनिक गठजोड़ का सुनियोजित खेल?अपर कलेक्टर कटनी ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि खसरा नंबर 143 और 164 को पुनः शासकीय मद में दर्ज किया जाए और संबंधित अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।अब सवाल यह है कि:फर्जी नामांतरण कराने वालों पर FIR होगी या नहीं?राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी करने वाले कर्मचारियों पर कार्रवाई कब?क्या जिले में ऐसी और भी सरकारी जमीनें निजी हाथों में पहुंच चुकी हैं?कटनी में सामने आया यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यदि शिकायतकर्ता संगठन आवाज नहीं उठाता, तो करोड़ों की सरकारी जमीन हमेशा के लिए निजी कब्जे में चली जाती।“सरकारी जमीन पर कब्जे का यह खेल क्या बिना संरक्षण के संभव था?” — अब जिलेभर में यही चर्चा है।
“कटनी में सरकारी जमीन घोटाला! फर्जी नामांतरण से करोड़ों की भूमि निजी संस्था के नाम”
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