MP Congress: मध्यप्रदेश की सियासत में दशकों तक एकछत्र राज करने वाले कांग्रेस के दो सबसे सीनियर नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के अच्छे दिन अब खत्म हो चुके हैं। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी की ओर से कांग्रेस में आधिकारिक तौर पर कोई मार्गदर्शक मंडल नहीं है, लेकिन दिल्ली आलाकमान ने इन दोनों ही नेताओं को पूरी तरह से लूप लाइन में धकेल दिया है। दिल्ली से लेकर भोपाल के राजनैतिक गलियारों में इस बात की सुगबुगाहट चरम पर है कि अब सूबे की कमान पूरी तरह से नई पीढ़ी के हाथों में सौंप दी गई है।
सरकार टूटने से शुरू हुआ संकट
कमलनाथ के सियासी ग्राफ में गिरावट तब शुरू हुई जब मुख्यमंत्री रहते हुए वे अपनी सरकार और पार्टी को टूटने से नहीं बचा सके। इसके बाद उनके नेतृत्व में लड़े गए विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी शिकस्त ने उनकी बची-खुची कमान को भी कमजोर कर दिया। उनके असल बुरे दिन तब हुए, जब लोकसभा चुनाव के ऐन पहले उन्होंने दलबदल के इरादे से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के दरवाजे पर दस्तक दी। लेकिन जब बात नहीं बनी, तो उन्हें मजबूरी में कांग्रेस में रुकना पड़ा। इसके तुरंत बाद छिंदवाड़ा से उनके बेटे नकुलनाथ भी चुनाव हार गए।
सोनिया-राहुल से मुलाकात
चुनाव के बाद कमलनाथ कई बार दिल्ली जाकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मिले, लेकिन आलाकमान ने उन्हें कोई नया दायित्व नहीं सौंपा। यहां तक कि राज्यसभा जाने के लिए उन्होंने अंतिम समय तक पूरी ताकत लगा दी थी, लेकिन राहुल गांधी ने उनके नाम को खारिज कर दिया।
दिग्विजय सिंह की भी घेराबंदी
वही दूसरी तरफ, राघौगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह के सितारे भी अब गर्दिश में नजर आ रहे हैं। लगातार चुनावी पराजयों के बावजूद आलाकमान ने उन्हें दो बार राज्यसभा जरूर भेजा, लेकिन अब प्रदेश संगठन में उनका रोब खत्म हो चुका है। हाल ही में हुए मीनाक्षी नटराजन मामले के बाद सूबे के प्रभारी हरीश चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दिग्विजय सिंह के साथ जो बर्ताव किया, उसने साफ कर दिया कि अब कांग्रेस में उनके भी अच्छे दिन समाप्त हैं।
समर्थक भी हुए गायब
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पूरे ड्रामे और अपमान के बाद गिने-चुने वफादारों को छोड़कर कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता दिग्विजय सिंह के पक्ष में खड़ा नजर नहीं आया। न ही उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले नेताओं पर आलाकमान कोई कार्रवाई करता दिख रहा है। मतलब साफ है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस की राह अब बदल चुकी है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे कद्दावर नेता अब केवल मूकदर्शक बनकर अपनी ही पार्टी के अंदर हाशिए पर खड़े रहने को मजबूर हैं।
