डिंडोरी /खबर डिजिटल /शैलेश नामदेव/डिंडौरी जिले के जनपद पंचायत बजाग अंतर्गत ग्राम पंचायत कारोपानी से इंसानियत को झकझोर देने वाली एक मार्मिक तस्वीर सामने आई है। जिस गौशाला को बेजुबानों की छतरी और सहारा बनना था, वही आज दर्दनाक मौत का जरिया बन चुकी है।
स्थानीय गौसेवकों की रोती-बिलखती पुकार पर जब ‘खबर डिजिटल’की टीम कारोपानी गौशाला पहुंची, तो मुख्य द्वार पर ताला लटक रहा था। अंदर से आती गायों की कराहट और सन्नाटे के बीच बेजुबानों की खामोश सिसकियां किसी का भी कलेजा कंपाने के लिए काफी थीं।
सूखी नांद, पसरा अंधेरा और जिंदगी की भीख मांगती आंखें
ताले में जकड़ी गौशाला के भीतर का मंजर इतना खौफनाक था कि देखने वालों की रूह कांप उठे। गौशाला के भीतर न तो कोई कर्मचारी था और न ही एक बूंद पानी। मवेशियों की नांद पूरी तरह खाली पड़ी थी, मानो कई दिनों से किसी ने अन्न का एक दाना तक वहां न डाला हो। कोने में रखा भूसा केवल एक दिन की मजबूरी की गवाही दे रहा था।
गंदगी के अंबार और घने अंधेरे के बीच शेड के नीचे चार गायें और उनके छोटे-छोटे बछड़े निढाल पड़े थे। एक गाय अपनी जिंदगी की अंतिम सांसें गिन रही थी। उसकी आंखें मानो वहां से गुजरने वाले हर इंसान से जिंदगी की भीख मांग रही थीं। वहीं दूसरी ओर, एक और गंभीर रूप से बीमार गाय भूख और प्यास से तड़प-तड़पकर अधमरी अवस्था में जमीन पर पसरी हुई थी।
लेकिन हैवानियत और लापरवाही का सबसे दिल दहला देने वाला दृश्य गौशाला से महज 60 मीटर की दूरी पर था, जहां पांच मृत गौवंश के शव खुले आसमान के नीचे पड़े सड़ रहे थे। नियति का यह कैसा क्रूर मजाक था कि जिन गायों को कभी पूजा जाता था, उनके मृत शरीर को आवारा कुत्ते बेदर्दी से नोच-नोचकर खा रहे थे।

”हमने अपने गहने गिरवी रख दिए, पर अब उम्मीद टूट रही है…”
इस अमानवीयता के बीच इंसानियत और ममता की एक बेहद भावुक कर देने वाली कहानी भी सामने आई। गौशाला का संचालन कर रही स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने जब अपना दर्द बयां किया, तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।
महिलाओं ने रुंधे गले से बताया, “हमें पिछले तीन महीनों से शासन से एक भी रुपया अनुदान नहीं मिला है। जब-जब गायें भूखी तड़पती हैं, हमसे उनका दर्द देखा नहीं जाता। हमने अपने सोने-चांदी के गहने तक गिरवी रख दिए, अपनी जमीनें गिरवी रख दीं ताकि हम चारा-पानी खरीद सकें। लेकिन अब हमारे पास भी कुछ नहीं बचा। बिना सरकारी मदद के हम कब तक इस व्यवस्था को खींचें?”
महिलाओं का यह बयान प्रशासनिक तंत्र के गाल पर करारा तमाचा है कि किस तरह एक तरफ महिलाएं अपना सब कुछ दांव पर लगाकर गौसेवा कर रही हैं और दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारी फाइलों में बजट डकार कर चैन की नींद सो रहे हैं।

कागजी इलाज और बेनकाब होते सरकारी दावे
जब गौशाला में अंतिम सांसें गिन रही उस लाचार गाय के संबंध में पशु चिकित्सा विभाग के फील्ड ऑफिसर से बात की गई, तो उन्होंने बड़ी आसानी से कह दिया कि “उपचार कर दिया गया है।”
लेकिन मौके की तस्वीरें और मरती हुई गायों की आंखें चीख-चीखकर झूठ की इस इमारत को ढहा रही थीं। सवाल यह उठता है कि यदि वाकई उपचार हुआ था और नियमित देखभाल हो रही थी, तो फिर एक मां समान बेजुबान जान तड़प-तड़पकर दम तोड़ने पर क्यों मजबूर है?
आक्रोश की ज्वाला: “यह गौसेवा नहीं, बेजुबानों का कत्ल है!”
इस भयावह मंजर को देखकर स्थानीय ग्रामीणों और गौसेवकों का खून खौल उठा है। लोगों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि सनातन संस्कृति में पूज्यनीय गायों की मौत के बाद उन्हें सम्मानजनक तरीके से दफनाने तक की जहमत नहीं उठाई गई और उन्हें कुत्तों का निवाला बनने के लिए छोड़ दिया गया।
गौ सम्मान आह्वान समिति जिला प्रभारी रोहित कांस्कार का कहना –
”यहां यह पहली बार नहीं हुआ है। पहले भी ऐसे भयावह दृश्य दिखे हैं, लेकिन अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। जिम्मेदार तुरंत मौके पर आएं, संधारण पंजी जांचें और दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई करें। अगर जल्द इंसाफ और व्यवस्था नहीं बदली, तो ‘गौ सम्मान आह्वान समिति’ सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करेगी।”
स्थानीय गौसेवक गणेश सिंग ठाकुर ने बताया
”गौशाला के पीछे फेंकी गई पांचों गायें 4-5 दिन पुरानी हैं। वे सड़ रही थीं और कुत्ते उन्हें नोच रहे थे। यह देखकर हर गांव वाले का दिल रो रहा है। बेजुबानों के साथ ऐसा अत्याचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, दोषियों को तुरंत जेल भेजा जाना चाहिए।”

कब जागेगा सोता हुआ प्रशासन?
कारोपानी की गौशाला केवल एक बदहाल इमारत नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीता-जागता श्मशान बन चुकी है। अब सबसे बड़ा और कड़वा सवाल जिला प्रशासन से है, आखिर इन बेजुबानों का कसूर क्या था? क्या सरकारी फाइलों में चलने वाली ‘गौ-संरक्षण’ की योजनाएं सिर्फ कागजी पेट भरने के लिए हैं?
डिंडौरी का जन-जन अब मांग कर रहा है कि इस अमानवीय कृत्य के दोषियों पर गैर-इरादतन हत्या जैसी सख्त धाराओं में कार्रवाई हो, ताकि फिर किसी बेजुबान को भूख और प्यास से तड़पकर अपनी जान न गंवानी पड़े।
