दतिया विधानसभा उपचुनाव का मतदान पूरा हो चुका है और अब सभी की नजरें 3 अगस्त पर टिकी हैं, जब चुनाव परिणाम घोषित किए जाएंगे. लेकिन मतगणना से पहले ही कांग्रेस के भीतर सियासी संघर्ष खुलकर सामने आ गया है. पार्टी के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती और कांग्रेस प्रत्याशी कुँअर घनश्याम सिंह के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है. दोनों नेताओं के बयानों ने जिले की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है और कांग्रेस के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है.
राजेंद्र भारती ने लगाए राजनीतिक सौदेबाजी के आरोप
राजेंद्र भारती ने दावा किया कि चुनाव घोषित होने के बाद घनश्याम सिंह ने उन्हें कई तरह के राजनीतिक प्रस्ताव दिए थे. उनका कहना है कि घनश्याम सिंह ने उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि वे फिलहाल दतिया से चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि वर्ष 2028 का विधानसभा चुनाव सेवढ़ा सीट से लड़ेंगे. भारती के अनुसार ऐसा होने पर दतिया सीट उनके लिए खाली हो जाएगी. उन्होंने कहा कि उन्होंने इस प्रस्ताव को तुरंत अस्वीकार कर दिया और किसी भी तरह की राजनीतिक सौदेबाजी से दूरी बनाए रखी.
घनश्याम सिंह के आरोपों पर पलटवार
इससे पहले कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने राजेंद्र भारती पर भितरघात और पार्टी के साथ गद्दारी जैसे गंभीर आरोप लगाए थे. इन आरोपों के बाद राजेंद्र भारती ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने घनश्याम सिंह को कायर और डरपोक बताते हुए कहा कि अपनी राजनीतिक कमजोरियों को छिपाने के लिए उन पर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं. भारती ने कहा कि उन्होंने हमेशा पार्टी और कार्यकर्ताओं के हित में काम किया है और किसी भी तरह की निजी राजनीति में विश्वास नहीं रखते.
कांग्रेस के लिए बढ़ी मुश्किलें
दो वरिष्ठ नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से चल रही बयानबाजी ने कांग्रेस की अंदरूनी एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. चुनाव परिणाम आने से पहले इस तरह का विवाद पार्टी नेतृत्व के लिए भी चिंता का विषय माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप का असर संगठन की छवि पर भी पड़ सकता है.
3 अगस्त के नतीजों पर टिकी निगाहें
अब दतिया की राजनीति में सबसे बड़ा इंतजार 3 अगस्त का है, जब मतगणना के बाद यह साफ होगा कि जनता ने किस उम्मीदवार पर भरोसा जताया. हालांकि चुनावी नतीजों से पहले कांग्रेस के भीतर छिड़ी यह सियासी जंग चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इस विवाद को किस तरह संभालता है और इसका चुनाव परिणाम पर कितना असर पड़ता है.
