भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में भादौ महीने की अंतिम राजसी सवारी आज निकाली जा रही है. इस मौके पर शहर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है. सवारी को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के भी व्यापक इंतजाम किए हैं. इस खास आयोजन में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शामिल हो रहे हैं.
सिंधिया परिवार के लिए महाकाल की सवारी में शामिल होना महज धार्मिक आस्था का विषय नहीं है. इसके पीछे परिवार से जुड़ी करीब ढाई सौ साल पुरानी परंपरा भी है. राजसी सवारी के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया राजपरिवार की ओर से भगवान महाकाल को पगड़ी अर्पित करेंगे.
हालांकि, सिंधिया परिवार से जुड़ी एक परंपरा ऐसी है, जिसके बारे में अक्सर सवाल पूछा जाता है. आखिर ऐसा क्या कारण है कि परिवार का कोई सदस्य उज्जैन शहर में रात नहीं ठहरता.
महाकाल की सवारी से पुराना रिश्ता
श्रावण और भादौ महीने में निकलने वाली भगवान महाकाल की सवारियों का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दौरान महाकाल अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं.
सिंधिया परिवार का भी महाकाल मंदिर और उज्जैन की धार्मिक परंपराओं से पुराना जुड़ाव रहा है. राजपरिवार के सदस्य लंबे समय से मंदिर की पूजा और सवारी से जुड़ी रस्मों में हिस्सा लेते रहे हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया का आज की राजसी सवारी में शामिल होना भी इसी परंपरा की निरंतरता माना जा रहा है.
महाकाल मंदिर के पुनर्निर्माण से भी जुड़ा इतिहास
सिंधिया परिवार और महाकाल मंदिर का संबंध केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है. इसका जुड़ाव उज्जैन के इतिहास से भी बताया जाता है.
इतिहास के अनुसार, पुराने दौर में मंदिर को नुकसान पहुंचने के बाद लंबे समय तक इसका स्वरूप प्रभावित रहा. बाद में मराठा शासन के समय सिंधिया परिवार ने मंदिर के पुनर्निर्माण में अहम भूमिका निभाई. बताया जाता है कि रानोजी सिंधिया जब उज्जैन पहुंचे तो मंदिर की स्थिति देखकर काफी दुखी हुए और उन्होंने इसके पुनर्निर्माण के निर्देश दिए.
क्यों नहीं रुकते रात में उज्जैन?
सिंधिया परिवार की एक पुरानी परंपरा आज भी कायम है. परिवार का कोई सदस्य उज्जैन शहर की सीमा के भीतर रात में ठहरने से बचता है. ज्योतिरादित्य सिंधिया भी जब उज्जैन आते हैं तो आमतौर पर रात्रि विश्राम शहर में नहीं करते.
बताया जाता है कि उज्जैन की सीमा से बाहर सिंधिया परिवार का पुश्तैनी निवास है. यात्रा के दौरान परिवार के सदस्य वहीं रुकते हैं. इस तरह शहर की सीमा के भीतर रात न बिताने की परंपरा को पीढ़ियों से निभाया जाता रहा है. महाकाल की भक्ति, इतिहास और राजपरिवार की परंपराओं से जुड़ी यही वजह उज्जैन में सिंधिया परिवार की मौजूदगी को खास बनाती है.
