नई दिल्ली: वेदांता एल्युमिनियम ने आज बताया कि यह भारत के विद्युत संचरण क्षेत्र में एल्युमिनियम की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तैयार है, क्योंकि भारत, पूरे देश में नवीकरणीय उर्जा पहुंचाने के लिए अपने अब तक के सबसे बड़े ग्रिड बिल्डआउट में से एक को पूरा कर रहा है।
वेदांता एल्युमिनियम के एक प्रवक्ता ने बताया, ‘‘भारत नवीकरणीय उर्जा के संचरण के लिए अपना संचरण नेटवर्क बना रहा है, इस के साथ एल्युमिनियम की मांग भी बढ़ रही है। विभिन्न क्षेत्रों और अनुप्रयोगों के लिए अलग क्षमता, कंडक्टिविटी और जंग-रोधी गुणों के अलग-अलग संयोजन की ज़रूरत होती है। ऐसे में आने वाले समय में ऐप्लीकेशन के अनुसार विशेष ग्रेड को विकसित और आपूर्ति करने की क्षमता और भी ज़रूरी हो जाएगी क्योंकि भारत एक भरोसेमंद और भविष्य के लिए तैयार पावर नेटवर्क बना रहा है।”
आईसीआरए द्वारा जून 2026 में किए गए मूल्यांकन के अनुसार, वित्तीय वर्ष 27 से 32 के बीच भारत में संचरण के लिए रु 5-6 ट्रिलियन का निवेश हो सकता है, यह एक बड़ी राष्ट्रीय विद्युत योजना (2023-2032) का भाग है, जिसमें कुल संचरण में कुल रु 9.15 लाख करोड़ से ज़्यादा का खर्च की योजना है। उम्मीद है कि इससे मार्च 2030 तक ट्रांसमिशन लाइन की लंबाई लगभग 6,27,000 सर्किट किलोमीटर और सबस्टेशन क्षमता लगभग 2,171 जीवीए तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके अलावा केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण ने वित्तीय वर्ष 2036 तक अलग से 900 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का लक्ष्य रखा है। इनमें से ज़्यादातर नवीकरणीय उर्जा वाले राज्यों में होगी, जो हाई-वोल्टेज डायरेक्ट-करंट कॉरिडोर से जुड़े हैं।
एल्युमीनियम, कॉपर से हल्का होता है, लंबी दूरी के लिए अधिक प्रभावी होता है और बिजली के संचरण की अच्छी क्षमता रखता है। ऐसे में विद्युत के प्रवाह के लिए इस धातु को महत्व दिया जा रहा है। इसका इस्तेमाल ओवरहेड लाइनों और कंडक्टर और केबल में जाने वाली वायर रॉड में बड़े पैमाने पर किया जाता है। ग्रिड क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत पहले से ही स्पष्ट हो रही हैः आईसीआरए के अनुसार, 22 मई 2026 तक, लगभग 54.8 गीगावॉट कमीशन्ड नवीकरणीय क्षमता में से, लगभग एक तिहाई अस्थाची ग्रिड एक्सेस पर ही थे। उत्तर और पश्चिम में जनरेटर को कटौती का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि नेटवर्क बिजली ले जाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
भारत का संचरण नेटवर्क नदी के किनारों, तटीय बेल्ट, उत्तर-पूर्व में पहाड़ी इलाकों और लंबे निकासी कॉरिडोर को पार करने के लिए तैयार है, इसलिए मांग के वैल्यू-एडेड, एप्लिकेशन-विशिेष्ट ल्यूमीनियम ग्रेड की ओर तेज़ी से शिफ्ट होने की उम्मीद है।
लगभग 2.4 मिलियन टन इंस्टॉड क्षमता के साथ वेदांता एल्यूमीनियम, भारत के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। जिसने इस बदलाव को ध्यान में रखते हुए अपना डाउनस्ट्रीम पोर्टफोलियो बनाया है। इसका 6201 एलॉय नदी पार करने और मुश्किल इलाकों में ज़्यादा मज़बूती और कम ढलान के लिए डिज़ाइन किया गया है, एएल59 तटीय और इंडस्ट्रियल माहौल के लिए जंग से सुरक्षा देता है, जबकि इसके 1350 और 1370 ग्रेड स्टैंडर्ड कंडक्टर, ट्रांसफॉर्मर वाइंडिंग और सबस्टेशन बसबार के लिए ज़रूरी हाई कंडक्टिविटी देते हैं। कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी वायर रॉड बनाने वाली कंपनियों में से एक है।
“भारत में ग्रिड बढ़ाने के अगले चरण में ऐसे मटीरियल की ज़रूरत होगी जो ऑपरेटिंग कंडीशन की बहुत बड़ी रेंज में भरोसेमंद तरीके से काम कर सकें। इलेक्ट्रिकल-ग्रेड वायर रॉड उस इकोसिस्टम का एक ज़रूरी हिस्सा हैं, चाहे उनका इस्तेमाल कंडक्टर, ट्रांसफॉर्मर या सबस्टेशन में किया जाए। हमारा फोकस इस डाउनस्ट्रीम क्षमता को मज़बूत करने पर है ताकि एल्युमीनियम भारत में उर्जा रूपान्तरण की मांग को पैमाने और भरोसे के साथ सपोर्ट कर सके,” वेदांता एल्युमीनियम के एक प्रवक्ता ने बताया।
सबस्टेशन बनने से मांग में और बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। आईसीआरए का कहना है कि मार्च 2030 तक हर साल लगभग 100 जीवीए की बढ़ोतरी होगी, जो हाल की लगभग 90 जीवीए की रफ़्तार से ज़्यादा है, जिसमें ट्रांसफॉर्मर और बसबार कंडक्टर में इस्तेमाल होने वाली उसी हाई-कंडक्टिविटी एल्युमीनियम रॉड का इस्तेमाल करेंगे।
खान मंत्रालय के एल्युमिनियम विज़न डॉक्यूमेंट में अनुमान लगाया गया है कि विद्युत क्षेत्र की खपत वित्तीय वर्ष 2024 में लगभग 2.4 मिलियन टन से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2030 तक 4 मिलियन टन और वित्तीय वर्ष 2047 तक 12.9 मिलियन टन हो जाएगी। इससे एल्युमिनियम भारत के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक बहुत ज़रूरी मटीरियल बन गया है, साथ ही कंस्ट्रक्शन और ऑटोमोबाइल में भी इसकी भूमिका बढ़ रही है।
