पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बने संकट का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है. कच्चे तेल की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से काफी उतार-चढ़ाव दर्ज किया जा रहा है. क्रूड ऑयल का भाव बढ़ते-बढ़ते 100 से 115 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ेगा.
फिलहाल आम उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर है. सरकारी सूत्रों के अनुसार, देश में पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ाने की कोई योजना नहीं है. सरकार अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हो रहे बदलावों पर लगातार नजर रख रही है और पश्चिम एशिया की स्थिति को भी करीब से मॉनिटर किया जा रहा है.
अभी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बदलाव नहीं
क्रूड ऑयल के दाम में तेजी आने के बावजूद फिलहाल घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की जाएगी. इसका सीधा फायदा वाहन चालकों और दूसरे ईंधन उपभोक्ताओं को मिलेगा. यानी आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने के बावजूद फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर तत्काल दबाव नहीं डाला जाएगा.
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि आगे भी कीमतें पूरी तरह स्थिर रहेंगी. भविष्य में पेट्रोल और डीजल के दामों को लेकर फैसला अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत, सप्लाई की स्थिति और पश्चिम एशिया में घटनाक्रम को ध्यान में रखकर लिया जा सकता है.
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना अहम?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में शामिल है. इस समुद्री रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आवाजाही होती है. अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है, तो वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है. इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों पर पड़ सकता है.
इसी वजह से भारत सरकार की नजर इस रूट पर बनी हुई है. सरकार की कोशिश है कि देश में ईंधन की सप्लाई लगातार सामान्य बनी रहे और किसी संभावित संकट का असर आम लोगों तक तुरंत न पहुंचे.
जरूरत पड़ी तो उठाए जा सकते हैं कदम
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं और इससे तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है, तो सरकार स्थिति के मुताबिक कदम उठा सकती है. जरूरत पड़ने पर तेल कंपनियों को आर्थिक मदद देने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है. इसका मकसद यही होगा कि वैश्विक बाजार में क्रूड महंगा होने का पूरा बोझ अचानक उपभोक्ताओं पर न आए.
