दमोह। जिले के महिला एवं बाल विकास विभाग में वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक मनमानी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। महिला सशक्तिकरण अधिकारी/सहायक संचालक के पद पर पदस्थ संजीव मिश्रा की नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज विभाग के पास उपलब्ध ही नहीं हैं। हैरानी की बात यह है कि अधिकारी 11 वर्ष से अधिक समय से जिले में पदस्थ हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति से जुड़े मूल रिकॉर्ड पर विभाग ही अनभिज्ञता जता रहा है।
सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत संजीव मिश्रा की नियुक्ति के समय प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों, पदस्थ जिलों और कार्यकाल की जानकारी मांगी गई थी। जिला महिला बाल विकास कार्यालय ने आवेदन को सागर संभाग स्थानांतरित कर दिया। वहां लोक सूचना अधिकारी ने पहले आवेदन अस्पष्ट होने की बात कही, बाद में केवल कार्यकाल की जानकारी दी, लेकिन नियुक्ति दस्तावेजों को “निजी जानकारी” बताकर देने से इंकार कर दिया।
जब नियमों का हवाला दिया गया तो विभाग ने रुख बदलते हुए कहा कि दस्तावेज संभागीय कार्यालय में उपलब्ध नहीं हैं और आवेदन पुनः जिला कार्यालय भेज दिया गया। इसके बाद भोपाल स्तर से रिकॉर्ड मंगाने की बात कही गई, लेकिन महीनों बीतने के बावजूद कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
सबसे चौंकाने वाला जवाब स्वयं अधिकारी संजीव मिश्रा की ओर से आया। उन्होंने लिखित रूप में कहा कि नियुक्ति के दस्तावेज संचालनालय भोपाल को दिए गए थे और यह भी कि उन्हें स्वयं नहीं पता कि उन्होंने कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए थे। साथ ही उन्होंने दोबारा दस्तावेज उपलब्ध कराने की आवश्यकता से भी इंकार कर दिया।
विभागीय जानकारी के अनुसार अगस्त 2014 से संजीव मिश्रा लगातार दमोह में पदस्थ हैं। इस दौरान उनके विरुद्ध कई शिकायतें सामने आईं, जिनमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दर्ज प्रकरण भी शामिल हैं, जिनकी जांच लंबित है।
इस मामले पर कलेक्टर सुधीर कोचर का कहना है कि नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज विभागीय स्तर पर होते हैं और यदि शिकायत प्राप्त होती है तो उसे शासन को भेजा जाएगा।


