भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ करवा चौथ के मौके पर चौथ माता के दर्शन करने को बेहद ही शुभ माना जाता है। माता की महिमा का गुणगान करने से हर वर की प्राप्ति संभव है। ऐसे में राजस्थान की रंग-बिरंगी संस्कृति और शाही इतिहास के बीच एक स्थान ऐसा है, जहां पर भक्तों का सालभर जमावड़ा लगा रहता है, और करवा चौथ के मौके पर महिलाएं अपनी मनोकामना मांगने के लिए यहां पर आती है, तो जानिये वो स्थान है, चौथ माता का मंदिर (Chauth Mata Temple) जोकि सवाईमाधोपुर जिले के एक छोटे से कस्बे चौथ का बरवाड़ा में स्थित है। करवा चौथ (Karwa Chauth 2025) के दिन महिला श्रद्धालु यहां व्रत खोलने और पति की लंबी आयु की कामना करने के लिए आती हैं।
1100 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजमान
हिन्दू धर्म की की मान्यता के अनुसार चौथ माता स्वयं माता पार्वती का ही एक रूप हैं। जिनका भव्य मंदिर बरवाड़ा के शक्तिगिरी पर्वत पर बना हुआ है। यहां माता के दर्शन के लिए भक्तों को 700 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, क्योंकि यह मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला की चोटी पर करीब 1100 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना है। इस मंदिर में भगवान गणेश और भैरव की मूर्तियां भी हैं। सफेद संगमरमर के पत्थरों से बना माता का मंदिर परंपरागत राजपूताना शैली को दर्शाता है।
451 में हुआ मंदिर का निर्माण
चौथ माता मंदिर की स्थापना 1451 में शासक भीम सिंह ने की थी। 1463 में मंदिर मार्ग पर बिजल की छतरी और तालाब का निर्माण कराया गया। मान्यता है कि करवा चौथ पर चौथ माता की पूजा करने से पति की लंबी उम्र के साथ सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसीलिये इस अवसर पर महिलाएं माता की पूजा-अर्चना करती हैं और अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। भक्तों का मानना है कि चौथ माता के दर्शन मात्र से जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं और मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।
कैसे हुई माता के मंदिर की स्थापना
प्रचलित कथा के अनुसार राजा भीम सिंह चौहान को स्वप्न में चौथ माता ने दर्शन दिए थे। माता ने राजा को आदेश दिया कि वो शक्तिगिरी पर्वत पर मंदिर बनवाएं। इसके बाद राजा ने पहाड़ी पर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया और तभी से यह स्थान चौथ माता धाम के रुप में जाना जाता है। एक अन्य लोककथा के अनुसार चौथ माता की पवित्र मूर्ति पंचल देश जोकि आज का उत्तर प्रदेश है, वहां से लाई गई थी। जब राजा भीम सिंह ने इस मूर्ति को यहां स्थापित किया। तो भयावह कहलाने वाले स्थान पर अलौकिक प्रकाश उत्पन्न हुआ और यह पहाड़ी एक तीर्थ स्थल के रुप में जानी जाने लगी।


