MP Bjp: मध्य प्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना है, लेकिन सत्ता के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक इसकी रणनीतिक बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। मध्यप्रदेश की सियासत का इतिहास गवाह है कि यहां मुकाबला हमेशा BJP और कांग्रेस के बीच ही रहता है। लेकिन जब-जब राज्य में किसी तीसरे विकल्प ने सिर उठाया है, उसका सीधा नुकसान भाजपा के वोट बैंक को और फायदा कांग्रेस को भुगतना पड़ा है। इस समय सूबे के डिजिटल गलियारों में कॉकरोच जनता पार्टी नाम के एक नए मूवमेंट की दस्तक ने राजनैतिक विश्लेषकों और सत्ताधारी दल को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
फॉलोअर्स की बाढ़ ने चौंकाया
जमीनी स्तर पर देखा जाए तो फिलहाल इस संगठन या तथाकथित पार्टी का कोई ठोस राजनीतिक वजूद नजर नहीं आता है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इसके सोशल मीडिया पेजों पर युवाओं और फॉलोअर्स की संख्या जिस तेज गति से बढ़ रही है, उसने खुफिया विभागों और राजनैतिक पंडितों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस उभरते ट्रेंड की तुलना अब साल 2018 के विधानसभा चुनाव से की जाने लगी है।
2018 में सपाक्स ने पलट दी थी बाजी?
साल 2018 के चुनावों को याद करें, तो उस समय सपाक्स नाम का एक संगठन कर्मचारियों और सामान्य वर्ग की नाराजगी के चलते अचानक वजूद में आया था। चुनाव में सपाक्स पार्टी भले ही खुद एक भी सीट जीतने में नाकाम रही थी, लेकिन उसने भाजपा के वोट बैंक में तगड़ी सेंधमारी की थी। जिन विधानसभा सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच हार-जीत का अंतर महज 2 से 3 हजार वोटों का था, वहां सपाक्स ने भाजपा विरोधी और असंतुष्ट वोटों को समेट लिया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा के हिस्से का वोट कट गया और कांग्रेस के उम्मीदवार मामूली अंतर से चुनाव जीतकर सत्ता में पहुंच गए थे।
टारगेट पर युवा वोटर!
इस नए कॉकरोच मूवमेंट की सबसे बड़ी चिंताजनक बात यह है कि इसका सीधा फोकस और टारगेट प्रदेश का युवा वर्ग है। मध्य प्रदेश में युवा मतदाताओं को भाजपा का सबसे मजबूत और कोर वोटर माना जाता है। राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मुहिम इसी तरह ऑनलाइन से ऑफलाइन मोड में शिफ्ट होती है और साल 2028 तक जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत कर लेती है, तो भाजपा के लिए खतरे की घंटी बज सकती है।
क्या कहते है जानकार?
राजनैतिक जानकारें की माने तो वर्तमान में युवाओं का एक बड़ा धड़ा ऐसा है जो रोज़गार, भर्ती परीक्षाओं और स्थानीय मुद्दों को लेकर संतुष्ट नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि यह युवा वर्ग कांग्रेस के पाले में भी जाने को तैयार नहीं दिख रहा है, और भाजपा को भी एकतरफा वोट देने के मूड में नहीं है। ऐसी त्रिशंकु स्थिति में, युवा मतदाता किसी भी तीसरे विकल्प को आजमाने के लिए सबसे ज्यादा लालायित रहते हैं। यदि कॉकरोच या ऐसा ही कोई अन्य तीसरा मोर्चा आगामी चुनाव में भाजपा के वोट शेयर में 2 से 3 फीसदी की भी सेंध लगाने में कामयाब हो जाता है, तो मध्य प्रदेश की राजनीति एक बार फिर 2018 की तरह करवट बदल सकती है, जहां सत्ता की चाबी बहुत मामूली अंतर पर आकर टिक गई थी।
