कटनी/-पिपरिया सहलावन– भाद्रपद मास की प्रतिपदा के अवसर पर शनिवार को पिपरिया सहलावन सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में लोक आस्था, भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक कजलिया पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। पर्व को लेकर सुबह से ही गांवों में उत्साह का माहौल रहा। महिलाओं और ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ कजलियों की पूजा-अर्चना की और इसके बाद एक-दूसरे को कजलियां भेंट कर पर्व की शुभकामनाएं दीं।आठ दिन पहले बोई जाती हैं कजलियांकजलिया पर्व की तैयारी कई दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। परंपरा के अनुसार घरों में करीब आठ दिन पूर्व गेहूं सहित अन्य अनाज के दाने बोकर कजलियां तैयार की जाती हैं। इन अंकुरित पौधों को पर्व के दिन विधि-विधान से बाहर निकालकर पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और ग्रामीण एक-दूसरे को कजलियां भेंट करते हैं।मान्यता है कि हरी-भरी और अच्छी तरह विकसित कजलियां समृद्धि, खुशहाली और अच्छी फसल का प्रतीक मानी जाती हैं। ग्रामीण जीवन में खेती-किसानी से जुड़े इस पर्व का विशेष महत्व है। कजलियों के माध्यम से प्रकृति, कृषि और पारिवारिक सुख-समृद्धि के प्रति आस्था भी व्यक्त की जाती है।कजलियां भेंट कर मजबूत होते हैं रिश्तों के बंधनकजलिया पर्व केवल पूजा और धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का पर्व भी माना जाता है। पर्व के दिन लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों के घर पहुंचकर कजलियां भेंट करते हैं। बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है तथा छोटों को स्नेह दिया जाता है।ग्रामीण अंचलों में कजलियां भेंट करने की परंपरा को पुराने रिश्तों को मजबूत करने और आपसी मनमुटाव दूर करने का माध्यम भी माना जाता है। यही कारण है कि पर्व के दौरान गांवों में एक अलग ही अपनत्व और आत्मीयता देखने को मिलती है।दिवंगत परिवारों के दुख में शामिल होने की अनूठी परंपराकजलिया पर्व की सबसे संवेदनशील और मानवीय परंपराओं में से एक है—पिछले एक वर्ष के दौरान जिन परिवारों ने अपने किसी सदस्य को खोया है, उनके घर पहुंचकर कजलियां भेंट करना।पिपरिया सहलावन में भी ग्रामीणों ने इस परंपरा का निर्वहन करते हुए ऐसे परिवारों के घर पहुंचकर उन्हें कजलियां भेंट कीं और उनके दुख में सहभागी बने। इस दौरान लोगों ने दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए शोकाकुल परिजनों को ढांढस बंधाया।यह परंपरा बताती है कि ग्रामीण समाज में पर्व केवल खुशियां मनाने का अवसर नहीं, बल्कि दुख की घड़ी में एक-दूसरे के साथ खड़े होने और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का माध्यम भी है।सुख-दुख में साथ खड़े रहने का देता है संदेशकजलिया पर्व की यही विशेषता इसे अन्य पर्वों से अलग पहचान देती है। एक ओर जहां लोग कजलियां भेंट कर खुशियां साझा करते हैं, वहीं दूसरी ओर जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उनके घर जाकर उनके दुख को अपना दुख मानते हैं।ग्रामीणों का मानना है कि कजलियां रिश्तों में मिठास और समाज में एकता का संदेश देती हैं। पर्व के माध्यम से नई पीढ़ी को भी अपनी लोक परंपराओं, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।लोक संस्कृति और कृषि परंपरा का जीवंत प्रतीककजलिया पर्व ग्रामीण भारत की उस समृद्ध लोक संस्कृति का हिस्सा है, जिसमें प्रकृति, खेती, परिवार और समाज एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। खेतों में नई फसल की उम्मीद, घरों में हरियाली और रिश्तों में अपनत्व—इन सभी भावनाओं को कजलियों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है।बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के बावजूद पिपरिया सहलावन जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में कजलिया पर्व की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। पर्व के दौरान गांव में लोगों की आवाजाही, एक-दूसरे के घर जाकर कजलियां भेंट करने और बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने का सिलसिला देर तक चलता रहा।कजलिया पर्व ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि त्योहारों की असली खुशी केवल स्वयं खुश रहने में नहीं, बल्कि अपनी खुशियां दूसरों के साथ भी बांटे
हरियाली, आस्था और अपनत्व का पर्व… पिपरिया सहलावन में हर्षोल्लास के साथ मना कजलिया पर्व
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