Special News : कुकररामठ का ऋणमुक्तेश्वर मंदिर… कल्चुरीकाल की दुर्लभ धरोहर

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Khabar Digital Desk

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Special News : कुकररामठ का ऋणमुक्तेश्वर मंदिर… कल्चुरीकाल की दुर्लभ धरोहर

डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/ जिला मुख्यालय से लगभग 14 किलोमीटर दूर, शांत प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित कुकररामठ का ऋणमुक्तेश्वर मंदिर इतिहास, कला और जनश्रुतियों का अनूठा संगम है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित यह मंदिर कल्चुरीकालीन स्थापत्य का एक जीवंत उदाहरण माना जाता है। यह मंदिर शिव को समर्पित है और स्थानीय मान्यताओं में इसका विशेष स्थान है। क्षेत्र में यह विश्वास प्रचलित है कि यहाँ पूजा करने से देव-ऋण, पितृ-ऋण और गुरु-ऋण से मुक्ति प्राप्त होती है—इसी कारण इसे ऋणमुक्तेश्वर नाम से भी जाना जाता है।

इतिहास और मान्यताएं
मंदिर के निर्माण का काल 10वीं से 11वीं शताब्दी माना गया है। यह भी जनश्रुति है कि यहां पहले 5–6 मंदिरों का समूह था, जिनमें से आज केवल एक मंदिर संरक्षित अवस्था में है।

मंदिर के निर्माण की दो प्रमुख कथाएँ क्षेत्र में प्रचलित हैं—स्वामिभक्त कुत्ते की कथालोकमान्यता के अनुसार एक बंजारे ने अपने निष्ठावान कुत्ते की समाधि के ऊपर यह मंदिर बनवाया था। कुत्ते को पुराने समय में ‘कुकर’ कहा जाता था, इसलिए इस स्थान का नाम पड़ा कुकररामठ। यह कथा आज भी स्थानीय लोगों में आस्था और आकर्षण का केंद्र है।

ऋणमुक्ति की कथा
कुछ विद्वानों का मत है कि मंदिर का निर्माण कल्चुरी राजा कोकल्लदेव के समय हुआ। कहा जाता है कि तत्कालीन शंकराचार्य ने अपने गुरु-ऋण से उऋण होने हेतु इस मंदिर का निर्माण करवाया, इसी कारण यह स्थान ऋणमुक्तेश्वर के नाम से विख्यात हुआ।

प्राचीन साहित्य में इस स्थल का वर्णन एक जैन मंदिर के रूप में भी मिलता है, जो इसके बहुस्तरीय इतिहास का संकेत देता है।

https://khabardigital.com/madhya-pradesh/ujjain-international-gita-festival-inauguration-2025/

वास्तुकला और संरचना
कुकररामठ का यह मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है, जिसमें पूर्व दिशा से सीढ़ियाँ बनी हैं। इसकी विशेषताएं

योजना में एक छोटा गर्भगृह, जिसके ऊपर चतुर्भुज रेखीय शिखर।
बाहरी दीवारों पर क्षेत्रीय शैली की अलंकृत मूर्तिकला।
गर्भगृह के सामने नंदी की प्रतिमा।
मंदिर का मुख पश्चिम दिशा में जो शिव मंदिरों में अपेक्षाकृत दुर्लभ है।
चारों ओर एक मंडप-नुमा संरचना के अवशेष, जहाँ कभी मूर्तियाँ स्थापित थीं।

पुरातात्त्विक अध्ययन दर्शाते हैं कि यहाँ प्रयुक्त कई वास्तु-अवशेष पूर्ववर्ती काल के हैं, जिससे प्रतीत होता है कि वर्तमान मंदिर का ढांचा किसी और पुराने निर्माण पर आधारित है।

एएसआई द्वारा संरक्षण
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भोपाल मंडल इस मंदिर की संरक्षा कर रहा है। परिसर के चारों ओर सुरक्षा दीवार बनाई गई है और संरचना को स्थिर रखने के लिए समय-समय पर मरम्मत कार्य किए जाते हैं।

कैसे पहुंचे

डिंडोरी से दूरी: लगभग 14 किमी
मार्ग: अमरकंटक रोड पर 10 किमी आगे → फिर 4 किमी गांव की ओर
सड़क मार्ग से सीधे मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।

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