भोपाल। केंद्र सरकार की प्रस्तावित कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) योजना 2026 को लेकर कर्मचारी संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। संगठनों का कहना है कि नए नियम लागू होने पर कर्मचारियों के रिटायरमेंट के समय मिलने वाले फंड में कमी आ सकती है। इसी मुद्दे पर देशभर के कर्मचारी संगठन एकजुट होकर विरोध की तैयारी कर रहे हैं।
संगठनों का दावा है कि इस बदलाव का असर करोड़ों कर्मचारियों और उनके परिवारों पर पड़ेगा।
कर्मचारी संगठनों ने क्या जताई चिंता?
कर्मचारी संगठनों के अनुसार, नई EPF योजना में कर्मचारियों को अपने वेतन से 12 प्रतिशत से कम अंशदान देने का विकल्प मिलने की बात कही जा रही है। इससे कर्मचारियों के हाथ में हर महीने अधिक वेतन आ सकता है, लेकिन भविष्य निधि खाते में जमा होने वाली राशि कम हो जाएगी।
संगठनों का कहना है कि इससे रिटायरमेंट के समय मिलने वाला फंड पहले की तुलना में काफी घट सकता है।
पुराने और नए नियम को लेकर क्या दावा किया गया?
कर्मचारी नेताओं का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में कर्मचारी और नियोक्ता दोनों की ओर से 12-12 प्रतिशत अंशदान EPF खाते में जमा होता है। इसके अलावा अन्य निर्धारित अंशदान भी जमा किए जाते हैं।
उनका दावा है कि यदि किसी कर्मचारी का वेतन एक लाख रुपये है, तो मौजूदा व्यवस्था में उसके EPF खाते में सालाना लगभग 2.88 लाख रुपये जमा हो सकते हैं। जबकि नए नियमों में यह राशि काफी कम होने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि, यह आंकड़े कर्मचारी संगठनों के दावे पर आधारित हैं। सरकार की ओर से इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार है।
सरकार से नियमों पर पुनर्विचार की मांग
सेवानिवृत्त कर्मचारी भविष्य निधि कल्याण समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंद्रशेखर परसाई और मध्य प्रदेश संविदा कर्मचारी अधिकारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष रमेश राठौर ने केंद्र सरकार से नए नियमों पर दोबारा विचार करने की मांग की है।
उन्होंने कहा कि कर्मचारियों और नियोक्ताओं का अंशदान पूरे वेतन के आधार पर जारी रहना चाहिए, ताकि कर्मचारियों को रिटायरमेंट के समय पर्याप्त आर्थिक सुरक्षा मिल सके।
देशभर में विरोध की तैयारी
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि EPF कर्मचारियों के भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है। यदि नए नियमों में बदलाव नहीं किया गया, तो देशभर में कर्मचारी संगठन विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। फिलहाल, इस मुद्दे पर कर्मचारी संगठनों ने अपनी आपत्तियां सार्वजनिक की हैं और केंद्र सरकार से नियमों की समीक्षा करने की मांग की है।
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