भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ मध्यप्रदेश में स्वामित्व योजना के तहत संपत्तियों की रजिस्ट्री का काम एक बार फिर अटक गया है। पटवारी संघ ने साफ कर दिया है कि जब तक निलंबित और बर्खास्त किए गए 4 हजार से अधिक पटवारियों की बहाली के आदेश जारी नहीं होते, तब तक वे योजना के तहत रजिस्ट्री का काम शुरू नहीं करेंगे। संघ का कहना है कि सरकार के साथ सहमति बनने के बावजूद कलेक्टरों की ओर से बहाली संबंधी आदेश जारी नहीं किए गए हैं।
रविवार शाम को किया वीडियो जारी
इस संबंध में मध्य प्रदेश पटवारी संघ ने रविवार शाम वीडियो जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात के बाद राजस्व विभाग ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 218 के तहत आदेश जारी किया है। इसके अनुसार, स्वामित्व योजना के अंतर्गत रजिस्ट्री से जुड़े मामलों में विवाद या न्यायालयीन प्रकरण की स्थिति में पटवारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने से संरक्षण देने की व्यवस्था की गई है। हालांकि, संघ का कहना है कि कानूनी संरक्षण से संबंधित आदेश जारी होने के बाद भी पटवारियों की बहाली का मामला लंबित है। जब तक संबंधित कलेक्टर बहाली के आदेश जारी नहीं करते, तब तक प्रदेश के पटवारी स्वामित्व योजना के काम से दूरी बनाए रखेंगे।
9 अक्टूबर को बनी थी सहमति, 12 अक्टूबर से काम शुरू करने का था ऐलान
पटवारियों की हड़ताल और स्वामित्व योजना के काम में आ रही बाधा को दूर करने के लिए 9 अक्टूबर की शाम सरकार और पटवारी संघ के बीच सहमति बनी थी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात के बाद संघ ने 12 अक्टूबर से योजना का काम दोबारा शुरू करने की घोषणा की थी। बैठक के बाद संघ की ओर से बताया गया था कि योजना में काम करने वाले पटवारियों को न्यायिक संरक्षण देने के लिए आदेश जारी किए जाएंगे। इसके साथ ही 17 सितंबर के बाद पटवारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को शून्य करने पर भी सहमति बनने की बात कही गई थी। वेतन विसंगति समेत बहाली के आदेश जारी नहीं होने की स्थिति में पटवारी संघ ने काम पर लौटने का फैसला वापस ले लिया।
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क्या है स्वामित्व योजना?
स्वामित्व योजना का उद्देश्य गांवों की आबादी भूमि पर रहने वाले लोगों के संपत्ति संबंधी अधिकारों का रिकॉर्ड तैयार करना है। इसके लिए ड्रोन सर्वे के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी भूमि का सर्वे किया गया और संपत्तियों के अधिकार अभिलेख तैयार किए गए।मध्य प्रदेश में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक करीब 50 लाख संपत्तियों की रजिस्ट्री किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस योजना के तहत पात्र हितग्राहियों को घर और जमीन की रजिस्ट्री के लिए स्टाम्प ड्यूटी तथा पंजीयन शुल्क नहीं देना है। इन खर्चों का वहन राज्य सरकार कर रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में अब तक 68.11 लाख अधिकार अभिलेख तैयार किए जा चुके हैं। इनमें 48.32 लाख निजी संपत्तियां शामिल हैं। ऐसे में पटवारियों के काम से अलग होने के फैसले का असर निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने पर पड़ सकता है।
आखिर पटवारियों को किस बात पर है आपत्ति?
पटवारी संघ की मुख्य आपत्ति स्वामित्व योजना के तहत रजिस्ट्री में निर्धारित भूमिका और उससे जुड़ी कानूनी जिम्मेदारी को लेकर है। संघ के मुताबिक, प्रक्रिया में ग्रामीण को क्रेता और पटवारी को विक्रेता या निष्पादक की भूमिका में रखा गया है। दस्तावेज पर पटवारी के हस्ताक्षर से सरकारी जमीन के हस्तांतरण की प्रक्रिया दर्ज होती है, जबकि संबंधित जमीन पर उनका व्यक्तिगत मालिकाना हक नहीं होता। पटवारियों का तर्क है कि भविष्य में जमीन की सीमा, हिस्सेदारी या कब्जे को लेकर विवाद उत्पन्न होने पर दस्तावेज निष्पादित करने वाले अधिकारी के रूप में उनकी कानूनी जिम्मेदारी तय हो सकती है। उनका कहना है कि जमीन के मालिकाना हक का अंतिम निर्धारण करने या रिकॉर्ड में बदलाव करने के अधिकार और जिम्मेदारियों को स्पष्ट किए बिना उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल करना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
जमीन के रिकॉर्ड में गड़बड़ियों का भी उठाया मुद्दा
पटवारी संघ ने जमीन से जुड़े रिकॉर्ड में विसंगतियों का मुद्दा भी उठाया है। गुना जिले में संघ की ओर से आरोप लगाया गया कि कुछ मामलों में जमीन पर वास्तविक कब्जा एक भाई का है, जबकि संबंधित पट्टे में तीन भाइयों के नाम दर्ज हैं। ऐसे मामलों में भविष्य में हिस्सेदारी और अधिकारों को लेकर विवाद पैदा होने की आशंका जताई गई है। संघ का कहना है कि उसे स्वामित्व योजना से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन पटवारियों की भूमिका और उनकी कानूनी जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए। इसके साथ ही संघ ने पहले की गई निलंबन और बर्खास्तगी की कार्रवाई वापस लेने तथा निजी पहचान से जुड़े डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग भी उठाई है।
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