जयपुर/खबर डिजिटल/ राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों में प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से नियुक्त होकर चतुर्थ श्रेणी के पदों पर काम कर रहे आउटसोर्स कर्मचारियों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि किसी कर्मचारी की नियुक्ति प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए होने मात्र से उसे न्यूनतम वेतनमान के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। इस फैसले से लंबे समय से न्यूनतम वेतनमान की मांग कर रहे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
दायर याचिकाओं पर की सुनवाई
जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने यह फैसला जनजातीय क्षेत्र विकास विभाग में कार्यरत कर्मचारियों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। मामले में राज्य सरकार ने अदालत के सामने तर्क रखा था कि संबंधित कर्मचारियों की नियुक्ति नियमित चयन प्रक्रिया के तहत नहीं हुई है। उनकी भर्ती प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से की गई है, इसलिए उन्हें सरकारी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के समान न्यूनतम वेतनमान का लाभ नहीं दिया जा सकता।
सरकार को दलील को किया दरकिनार
हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियुक्ति का माध्यम कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान के वैधानिक लाभ से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता। पीठ ने पूर्व में समान परिस्थितियों वाले मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया और कर्मचारियों की याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।
60 दिन के भीतर जारी करने होंगे आवश्यक आदेश
हाईकोर्ट ने संबंधित विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर आवश्यक प्रशासनिक आदेश जारी किए जाएं। इसके तहत चतुर्थ श्रेणी के पदों पर कार्यरत संबंधित कर्मचारियों को लागू न्यूनतम वेतनमान का लाभ देने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
कर्मचारियों के लिए अहम निर्णय
अदालत के इस फैसले को आउटसोर्स व्यवस्था के तहत सरकारी विभागों में काम कर रहे कर्मचारियों के लिए अहम माना जा रहा है। इससे उन कर्मचारियों को राहत मिल सकती है, जो प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से नियुक्त होने के कारण अब तक न्यूनतम वेतनमान के लाभ से वंचित थे।









