डिंडौरी/शैलेष नामदेव/खबर डिजिटल/ जिले के छात्रावासों की स्थितियां सुधारने के सभी दावे जमीन पर फेल साबित हो रहे हैं। लगातार शिकायतों, जनप्रतिनिधियों के दबाव और मीडिया की कवरेज के बावजूद छात्रावासों की बदहाली जस की तस बनी हुई है। विभागीय अधिकारी मानो आंखें बंद कर बैठे हों और आदिवासी छात्र-छात्राओं के नाम पर मनमानी खुलकर जारी है।
वास्तविकता से दूर रिपोर्ट
बुधवार को विधायक ओमप्रकाश धुर्वे ने 100 सीटर क्रीड़ा परिसर आश्रम, शहपुरा का पुनः निरीक्षण किया। निरीक्षण में सामने आई गंभीर अव्यवस्थाओं ने विभागीय कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। खास बात यह है कि करीब एक माह पहले भी अधिकारियों ने औपचारिकता के तौर पर निरीक्षण कर रिपोर्ट भेजी थी, परंतु वास्तविक स्थिति में किसी भी प्रकार का सुधार नहीं दिखा।
निरीक्षण अधिकारियों की लापरवाही उजागर
विधायक धुर्वे ने कहा कि “अधिकारियों द्वारा सिर्फ कागजों में सुधार दिखाया जा रहा है, जबकि वास्तविक स्थिति बेहद चिंताजनक है। लगातार शिकायतों के बाद भी सुधार न होना संबंधित निरीक्षण अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग करता है।”
ठंड में भी चप्पलों के बिना थीं बालिकाएं
निरीक्षण के दौरान यह हैरान करने वाली स्थिति सामने आई कि ठंड के मौसम में भी आश्रम की कई बालिकाओं के पास पहनने के लिए चप्पल तक नहीं थीं। इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए मंडल अध्यक्ष भजन चक्रवर्ती, वरिष्ठ नेता बाबा ठाकुर, महामंत्री राजेंद्र तिवारी, तथा मंडल मंत्री किशन झारिया के सहयोग से कुल 100 जोड़ी चप्पलें बालिकाओं को वितरित की गईं। चप्पलें मिलते ही बालिकाओं के चेहरों पर खुशी और राहत साफ दिखाई दी।
बड़ा सवाल – अफसरशाही किसके इशारों पर सक्रिय?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों की शिकायतों पर भी कोई असर नहीं हो रहा है, तो जिले के उच्च अधिकारी आखिर किसके इशारों पर काम कर रहे हैं? बीते दिनों खबर डिजिटल ने बिना टेंडर के घटिया क्वालिटी की सामग्रियों की मनमानी सप्लाई का मामला उजागर किया था, जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह भी संकेत देता है कि विभागीय लापरवाही किसी बड़े संरक्षण में जारी है। लगातार निरीक्षण, शिकायत और खुलासों के बावजूद शहपुरा क्रीड़ा परिसर आश्रम सहित अन्य छात्रावासों की स्थिति में सुधार न होना चिंताजनक है। यदि जल्द ही प्रशासनिक स्तर पर गंभीर कार्रवाई नहीं की गई तो इसका सीधा असर उन गरीब एवं आदिवासी विद्यार्थियों पर पड़ेगा, जो बेहतर सुविधाओं की उम्मीद में आश्रमों पर निर्भर रहते हैं।


