डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/जिस किसान के पसीने से देश का गोदाम भरता है, आज वही किसान व्यवस्था की बेरुखी और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। डिंडौरी जिले के कुकररामठ लैंप्स के सरहरी उपार्जन केंद्र में फैली अव्यवस्थाओं ने किसानों के सब्र का बांध तोड़ दिया। दो दिनों से बारदाने (बोरियों) की किल्लत झेल रहे आक्रोशित किसानों ने अंततः मंगलवार को जबलपुर-अमरकंटक हाईवे पर चक्काजाम कर दिया, जिससे सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।
बदहाली की दास्तां: किसान बना मजदूर, व्यवस्था हुई बेपर्दा
सरहरी उपार्जन केंद्र की जमीनी हकीकत कागजी दावों से कोसों दूर है। किसानों का आरोप है कि केंद्र पर सुविधाओं के नाम पर शून्य है। स्थिति यह है कि केंद्र पर रजिस्टर में 22 मजदूरों के नाम दर्ज हैं, लेकिन मौके पर एक भी मजदूर नजर नहीं आया। मजबूरी में किसान खुद ही मजदूर और हम्माल की भूमिका निभा रहे हैं। बोरी ढोने से लेकर सिलाई और तौल तक का सारा काम किसान और उनके परिवार को खुद करना पड़ रहा है। किसानों ने आरोप लगाया कि केंद्र प्रभारी अपने चहेतों को पहले बारदाने उपलब्ध करा रहे हैं, जबकि आम किसान घंटों कतार में खड़े रहने को मजबूर है।
प्रति बोरी 200 ग्राम की कटौती: खुली लूट का आरोप
प्रदर्शनकारी किसानों ने शासन-प्रशासन के सामने एक गंभीर मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि तौल के नाम पर हर बोरी में 200 ग्राम अतिरिक्त अनाज लिया जा रहा है। इसे किसानों ने अपनी मेहनत पर ‘सीधी डकैती’ करार दिया है। जब इस संबंध में केंद्र के जिम्मेदारों से जवाब मांगा गया, तो वे संतोषजनक उत्तर देने के बजाय बचते नजर आए।
प्रशासन के दखल के बाद खुला जाम
चक्काजाम की सूचना मिलते ही एसडीओपी डिंडौरी सतीश द्विवेदी मौके पर पहुंचे। उन्होंने हालात की गंभीरता को समझते हुए किसानों को शांत कराया और उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया। अधिकारी ने मौके पर ही केंद्र के जिम्मेदारों को कड़ी फटकार लगाई, जिसके बाद किसानों ने जाम खोला और यातायात बहाल हो सका।
आंकड़ों में खरीद की स्थिति
लैंप्स प्रबंधक के अनुसार, सरहरी केंद्र के लिए 40 हजार क्विंटल धान खरीदी का लक्ष्य रखा गया था। अब तक 24,220.4 क्विंटल की खरीदी पूरी हो चुकी है, जिसके 50 हजार तक पहुंचने की उम्मीद है। हालांकि भुगतान समय पर होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की कमी इन दावों पर सवालिया निशान लगा रही है।
बड़ा सवाल
जब किसान अपनी उपज बेचने आता है, तो उसे बारदाने की किल्लत, मजदूरों की कमी और ‘कटौती’ जैसी समस्याओं से क्यों जूझना पड़ता है? क्या प्रशासन इस ‘सिस्टम की लूट’ की जिम्मेदारी लेगा, या अन्नदाता यूं ही सड़कों पर इंसाफ मांगता रहेगा?


