MP Nigam Mandal: मध्य प्रदेश भाजपा में इन दिनों दो अलग-अलग तस्वीरें देखने को मिल रही हैं। एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल संगठनात्मक नियुक्तियों को रफ्तार दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में निगम-मंडल की नियुक्तियों को लेकर सन्नाटा पसरा है। बीते शनिवार की शाम चार प्रकोष्ठों के संयोजकों की घोषणा ने यह तो साफ कर दिया कि संगठन सक्रिय है, लेकिन सरकार के स्तर पर चल रही अंतर्कलह अब खुलकर सामने आने लगी है।
ढाई साल का कार्यकाल, पर नियुक्तियां शून्य
मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार को सत्ता में आए ढाई साल बीतने को हैं। गौरतलब है कि निगम-मंडलों का कार्यकाल महज तीन साल का होता है। 2027 से चुनावी साल शुरू हो जाएगा, लेकिन भाजपा अब तक अपने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को इन बोर्डों में एडजस्ट करने में नाकाम रही है। संघ, संगठन और सरकार के बीच कई दौर की समन्वय बैठकें हुईं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा।
सीएम और मंत्रियों के बीच ‘खींचतान’ बनी रोड़ा!
सूत्रों की मानें तो नियुक्तियों में देरी की सबसे बड़ी वजह मुख्यमंत्री और कुछ कद्दावर मंत्रियों के बीच चल रही खींचतान मानी जा रही है। नियुक्तियों के लिए मंत्रियों को अंचलवार को-आर्डिनेटर बनाया गया था ताकि वे अपने क्षेत्रों से मजबूत नाम दे सकें। मंत्रियों ने सूचियां सौंपीं, लेकिन चर्चा है कि सीएम मोहन यादव ने अधिकांश नामों को सिरे से खारिज कर दिया है। यह टकराव इस कदर बढ़ गया है कि अब विरोधियों को भी सरकार के अंदर जल रही अंतर्कलह साफ दिखाई दे रही है, जबकि शीर्ष नेतृत्व इस पर फिलहाल मौन है।
कार्यकर्ताओं को उलझाने की कवायद!
सत्ता के इस विवाद की आंच जमीनी कार्यकर्ताओं तक न पहुंचे, इसके लिए प्रदेश संगठन अब फायरफाइटर की भूमिका निभा रहा है। कार्यकर्ताओं के असंतोष को दबाने और उन्हें व्यस्त रखने के लिए संगठन लगातार नए-नए कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि सरकार के अंदर की यह आग जल्द नहीं बुझी, तो 2027 की चुनावी डगर भाजपा के लिए बेहद मुश्किल हो सकती है।


