डिंडोरी /खबर डिजिटल /शैलेश नामदेव/ मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति खराब होती जा रही है। डिंडौरी जिला अस्पताल से ऐसी एक मामला सामने आये है जिससे मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे की संवेदनाओं पर बहुत गहरा सवालिया निशान खड़ा हो गया है।
मामला डिंडौरी के एक 18 वर्षीय युवक की है, जिसने भूलवश या किसी अज्ञात मजबूरी में चूहा मार दवा (जहर) खा ली थी। जब वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था, तब बेबस परिजन उसे आंखों में उम्मीद के आंसू लिए भागते हुए डिंडौरी के जिला अस्पताल लेकर पहुँचे। परिजनों को लगा कि यहाँ सफेद कोट पहने मसीहा उनके लाल को नया जीवन देंगे।
लेकिन अस्पताल के भीतर जो हुआ, उसने हर किसी का कलेजा कंपा दिया। जहर के असर को मिटाने और पेट साफ करने जैसी बेहद संवेदनशील और वैज्ञानिक प्रक्रिया के लिए डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने मेडिकल प्रोटोकॉल को ताक पर रख दिया। मरीज को जो ड्रिप या जीवनरक्षक सलाइन चढ़नी चाहिए थी, उसकी जगह साधारण मिनरल वाटर यानी ‘बिसलेरी की बोतल’ का इस्तेमाल किया जाने लगा।
लाचार परिजन दूर खड़े होकर अपनों की जिंदगी को इस तरह ‘जुगाड़’ के भरोसे लटकते देखते रहे, लेकिन अस्पताल के जिम्मेदार बेपरवाह बने रहे। अस्पताल में मौजूद किसी जागरूक नागरिक ने जब इस खौफनाक मंजर को अपने कैमरे में कैद कर सोशल मीडिया पर साझा किया, तो देखते ही देखते पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया। वीडियो में साफ दिख रहा है कि किस तरह एक गंभीर मरीज के इलाज में भारी लापरवाही बरती जा रही है।
वीडियो सामने आते ही लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। हर कोई यही सवाल पूछ रहा है‘क्या गरीब की जिंदगी की कोई कीमत नहीं होती? क्या एक मासूम का जीवन बिसलेरी की बोतल के भरोसे छोड़ दिया जाएगा?’
मामला तूल पकड़ते ही स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों में अफरा-तफरी मच गई। अपनी साख बचाते हुए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज पांडे ने पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज पांडे का बयान “मरीज को बिसलेरी की ड्रिप नहीं चढ़ाई गई थी, बल्कि पेट साफ करने की प्रक्रिया में पहले नॉर्मल सलाइन और बाद में मिनरल वाटर का उपयोग किया गया था। यह तरीका पूरी तरह से गलत, अमानक और चिकित्सा नियमों के सख्त खिलाफ है। हमने मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। जांच के बाद जो भी डॉक्टर या नर्सिंग स्टाफ दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त से सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।”
यह कोई पहली बार नहीं है जब किसी सरकारी अस्पताल से ऐसी हृदयविदारक तस्वीर सामने आई हो। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मरीज अस्पताल के बेड पर जिंदगी की भीख मांग रहा होता है, तब जिम्मेदार इतने संवेदनहीन कैसे हो जाते हैं? क्या जांच की कागजी फाइलों में यह मामला भी दबा दिया जाएगा, या सचमुच उन दोषियों को सजा मिलेगी जिन्होंने एक 18 साल के मासूम की जिंदगी को दांव पर लगा दिया? डिंडौरी की जनता आज स्वास्थ्य व्यवस्था से यही जवाब मांग रही है।
