इंदौर/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ मध्यप्रदेश की राजनीति में इंदौर को भारतीय जनता पार्टी का सबसे मजबूत संगठनात्मक आधार माना जाता है। वर्षों से यह शहर पार्टी की रणनीतियों, संगठनात्मक प्रयोगों और नए राजनीतिक मॉडल तैयार करने का केंद्र रहा है। हालांकि मौजूदा दौर में यही इंदौर भाजपा के अंदरूनी समीकरणों और गुटबाजी की सबसे बड़ी मार झेलता नजर आ रहा है। प्रदेशभर में विभिन्न राजनीतिक नियुक्तियों का दौर लगभग पूरा हो चुका है, लेकिन इंदौर अब भी फैसलों का इंतजार कर रहा है।
कार्यकर्ताओं में निराशा का माहौल
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि निगम, मंडल, प्राधिकरण और अन्य सरकारी संस्थानों में लगातार नियुक्तियां हो रही हैं, लेकिन इंदौर के किसी भी प्रमुख नेता को अब तक अहम जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। इतना ही नहीं, नगर निगम में एल्डरमैन की नियुक्ति समेत कई स्थानीय संगठनात्मक फैसले भी अटके हुए हैं, जिससे कार्यकर्ताओं के बीच निराशा और असंतोष का माहौल बनता जा रहा है।
प्रयोगों का शहर प्राथमिकताओं में दूर
भाजपा के संगठनात्मक इतिहास में इंदौर की भूमिका हमेशा विशेष रही है। यहां तैयार किए गए कई संगठनात्मक प्रयोग बाद में प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर अपनाए गए। शक्ति केंद्र जैसी अवधारणा से लेकर युवा नेतृत्व को आगे लाने की रणनीति तक, इंदौर ने पार्टी को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके बावजूद वर्तमान परिस्थितियों में यह शहर संगठन की प्राथमिकताओं से कुछ हद तक दूर दिखाई दे रहा है।
कुछ ही मोर्चों में हुई नियुक्तियां
संगठन के विभिन्न मोर्चों और प्रकोष्ठों में भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग मोर्चा को छोड़कर युवा मोर्चा, महिला मोर्चा सहित कई प्रमुख इकाइयों में अभी तक नए पदाधिकारियों की घोषणा नहीं हुई है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए नामों पर प्रारंभिक सहमति बनने के बावजूद अंतिम निर्णय लंबित है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अलग-अलग गुटों के बीच तालमेल और सहमति नहीं बनने के कारण नियुक्तियों की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही है।
