Tuesday, November 3, 2026
Homeमध्यप्रदेशशिक्षक दिवस की आड़ में उपेक्षा का दंश: डिंडोरी कलेक्ट्रेट में जमीनी...

शिक्षक दिवस की आड़ में उपेक्षा का दंश: डिंडोरी कलेक्ट्रेट में जमीनी सच पर उतरे ‘भविष्य के शिल्पकार’

डिंडोरी /खबर डिजिटल /शैलेश नामदेव/ डिंडोरी, राष्ट्र निर्माण में जिस शिक्षक को सर्वोच्च दर्जा देकर मंचों से सम्मानित किया जाता है, उसी शिक्षक दिवस पर डिंडोरी कलेक्ट्रेट परिसर एक विरोधाभास और प्रशासनिक उदासीनता की गंभीर तस्वीर का गवाह बना। एक तरफ जहाँ शहर में माल्यार्पण, शॉल-श्रीफल और मंचीय भाषणों का दौर जारी था, वहीं दूसरी ओर आजाद स्कूल अतिथि शिक्षक संघ के तत्वावधान में सैकड़ों अतिथि शिक्षक अपनी बुनियादी मांगों को लेकर कलेक्ट्रेट परिसर में नंगे फर्श पर बैठकर अपना हक मांग रहे थे। जो शिक्षक रोजाना बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव गढ़ते हैं, आज वे स्वयं अपने अंधकारमय भविष्य को लेकर शासन-प्रशासन के सामने एक अनुत्तरित प्रश्न की तरह खड़े हैं।

​घोषणायें बनीं कागज़ी, वादों से बढ़ा असंतोष

​संघ के जिला अध्यक्ष इमरान मलिक ने कलेक्ट्रेट परिसर में विरोध जताते हुए स्पष्ट किया कि यह आंदोलन अचानक उपजा आक्रोश नहीं है, बल्कि सालों की उपेक्षा का परिणाम है। 2 सितंबर 2023 की बहुचर्चित घोषणाओं और 5 अगस्त को शासन स्तर से मिले मौखिक आश्वासनों के बावजूद, प्रशासनिक पन्नों पर क्रियान्वयन की रफ्तार शून्य बनी हुई है।

​अतिथि शिक्षकों की प्रमुख मांगें निम्न तीन बिंदुओं पर केंद्रित हैं: ​सेवाओं का नियमितीकरण: वर्षों से पूर्ण निष्ठा के साथ पढ़ा रहे शिक्षकों को स्थायी रोजगार की सुरक्षा प्रदान करना। ​सम्मानजनक मानदेय वृद्धि: बढ़ती महंगाई के दौर में वर्तमान अल्प मानदेय को व्यावहारिक और आजीविका चलाने योग्य बनाना। ​आकस्मिक अवकाश आदेश जारी होना: नियमित शिक्षकों की भांति बुनियादी सीएल अवकाश संबंधी दिशानिर्देश लागू करना।

​अल्प मानदेय और रोजगार की अनिश्चितता का दोहरा दबाव

​जिले के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित शासकीय विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था काफी हद तक इन्हीं अतिथि शिक्षकों के भरोसे टिकी है। सीमित संसाधनों और न्यूनतम वेतन के बावजूद वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं। परंतु, वर्तमान दौर की महंगाई में अल्प मानदेय पर परिवार का पालन-पोषण करना मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना का कारण बन रहा है।

मंचों का आडंबर बनाम ज़मीन का सच

​लोकतांत्रिक व्यवस्था में ज्ञापन देना और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। किंतु जब व्यवस्था के आधारस्तंभों को ही अपने अधिकारों के लिए बार-बार सड़कों पर बैठना पड़े, तो यह शासन के प्रति अविश्वास को गहराता है।

​शिक्षक दिवस का वास्तविक अर्थ केवल औपचारिक भाषणों और माल्यार्पण तक सीमित नहीं हो सकता। सच्चा सम्मान तभी संभव है जब कार्य का उचित मूल्यांकन हो और भविष्य को स्थायित्व मिले। डिंडोरी की यह घटना शासन के लिए एक चेतावनी है कि केवल आश्वासनों से अविश्वास की खाई नहीं भरी जा सकती; इसके लिए स्पष्ट समयसीमा और ठोस नीतिगत निर्णयों की तत्काल आवश्यकता है।

सम्बंधित ख़बरें

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

लेटेस्ट