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हिमाचल में फलों का गोविंदा..और अब सेब का प्रतिद्वंदी

हिमाचल का जापानी फल (Persimmon) – सेब का विकल्प और सुपरफूड

न न, यह टमाटर नहीं है और न ही तेंदू है। रंग भले ही नारंगी है परन्तु संतरा भी नहीं है। यह है हिमाचल का अमर फल या चीनी सेब…जो स्वाद और सेहत का खजाना है। फिल्मों में जैसे पहले मिथुन चक्रवर्ती और बाद में गोविंदा को गरीबों का अमिताभ बच्चन कहा जाता था इसी तरह इस फल को भी पहले गरीबों का सेब कहा जाता था लेकिन धीरे धीरे इसने अपने स्वाद,कीमत और सेहत से भरपूर गुणों के कारण अलग पहचान कायम कर ली है..और अब यह सेब का विकल्प बन रहा है।

स्थानीय भाषा में इसे ‘जापानी फल’ या ‘काकी’ कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Diospyros kaki है और पहली बार 1940 के दशक में शिमला के नारकंडा इलाके में इसका पदार्पण माना जाता है।

वैसे, अपने जन्मस्थान जापान में इसका मूल नाम काकी है, जिसका अर्थ होता है देवताओं का फल। अंग्रेजी में इसे पर्सिमन (Persimmon) के नाम से जाना जाता है। इजराइल में इसे शैरॉन फ्रूट तो कुछ देशों एबेन फ्रूट कहा जाता है। हिमाचल में इसे लंबे समय तक खराब नहीं होने के कारण अमर फल और सेब से सस्ता और उसका विकल्प होने के कारण चीनी सेब भी कहा जाता है।

दूर से टमाटर की तरह दिखने वाला यह चमकीला नारंगी फल अपने भीतर शहद की मिठास समेटे है। यह अपने स्वाद से हिमाचल के किसानों के लिए न केवल आर्थिक वरदान साबित हो रहा है, बल्कि स्वास्थ्य के खजाने के रूप में भी उभर रहा है।

देश में हिमाचल प्रदेश को वैली ऑफ फ्रूट्स कहा जाता है क्योंकि अपने पहाड़ों, ठंडी हवाओं और उपजाऊ मिट्टी के कारण यह सदियों से फलों का स्वर्ग है। यहां सेब की लालिमा से लेकर खुबानी की सुनहरी चमक तक हर मौसम में फलों की खुशबू बिखरी रहती है ।

ऐसा माना जाता है हिमाचल में फलों के राजा सेब ने अपनी यात्रा की शुरुआत ब्रिटिश काल में शुरू की थी । मौसम में बदलाव के साथ यहां की फ्रूट बास्केट में कई फल जुड़ते जा रहे हैं। यह सेब पर निर्भरता कम करने और कमाई के नए रास्ते तलाशने की कवायद भी है। शायद, यही कारण है कि जापानी फल अब शिमला, कुल्लू, मंडी, सोलन, लाहौल-स्पीति, किन्नौर और चंबा जिलों तक में भरपूर पैदा हो रहा है ।

आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल फल उत्पादन 7.53 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जिसमें जापानी फल, कीवी और जैकफ्रूट जैसे वैकल्पिक फल भी भरपूर मात्रा में हैं। जापानी फल की खूबी यह है कि इसे सेब के साथ भी लगाया जा सकता है, जिससे मिश्रित खेती संभव हो जाती है। सरकार भी इसे बढ़ावा दे रही है ताकि छोटे किसान परिवारों की आय दोगुनी हो सके। हिमाचल में इसकी फ़ुयू और हेचिया जैसी प्रजातियाँ बाजार में लोकप्रिय हैं।

जापानी फल स्वाद के साथ साथ स्वास्थ्य का खजाना भी है। इसमें आंखों के लिए विटामिन ए, नींबू से दोगुना विटामिन सी और पाचन के लिए भरपूर फाइबर है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे टैनिन, कैटेचिन और गैलिक एसिड कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोगों से लड़ने में मदद करते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि यह सूजन कम करता है, कोलेस्ट्रॉल घटाता है और हड्डियों को मजबूत बनाता है। पारंपरिक चिकित्सा में, इसके पत्तों की चाय पेट दर्द और दस्त ठीक करती है, जबकि फल रक्तचाप नियंत्रित रखता है। डायबिटीज वाले मरीजों के लिए यह आदर्श है, क्योंकि यह ब्लड शुगर स्थिर रखता है। जापानी फल पोटेशियम और फॉस्फोरस का भी एक अच्छा स्रोत है।
कुल मिलाकर यह किसी ‘सुपरफूड’ से कम नहीं है। लेकिन ज्यादा खाने से इसमें मौजूद टैनिन के कारण पेट में गांठ बनने का खतरा भी रहता है।

संक्षेप में कहें तो जापानी फल हिमाचल में एक फल भर नहीं है, बल्कि आशा का प्रतीक बन रहा है। यह न केवल किसानों को सेब की एकतरफा निर्भरता से मुक्त कर रहा है बल्कि पर्यटकों को नई स्वाद यात्रा पर भी ले जाने के साथ साथ स्वास्थ्य का अनमोल उपहार भी दे रहा है। इसलिए अगली बार जब आप हिमाचल की सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों तो प्रकृति की इस नारंगी स्वादिष्ट और सेहतमंद नेमत को नजरअंदाज न करें ।

लेखक संजीव शर्मा।

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