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Homeलेखहमारे क्षेत्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ:- प्रारंभ, विकास एवं समाजोत्थान

हमारे क्षेत्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ:- प्रारंभ, विकास एवं समाजोत्थान

आरएसएस के सौ बसंत पूरे

लेखक – लव नवाल (स्वयंसेवक)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने जीवन के सौ बसंत देख लिए हैं। सौ वर्ष पूर्व लगाया गया नन्हा सा बीज आज विशाल और विस्तीर्ण वटवृक्ष बन चुका है जिसकी शाखाएं विश्वव्यापी बनकर ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ के साथ ‘राष्ट्र प्रथम’ के अपने लक्ष्य को मुखरित कर रही हैं। बीज से वृक्ष तक की यह यात्रा इतनी सरल नहीं थी जितनी सरलता आज अनुमानित की जा सकती है। कई प्रतिकूल परिस्थितियों और प्रबल प्रतिकारों को धैर्यपूर्वक पार करते हुए यह शतंजीवी हुआ है। विविधता भरे प्रांत/ प्रदेशों वाले इस देश में संघ का विकास और विस्तार भी विविध स्थितियों में हुआ है।
साल 1925 और स्थान नागपुर। यह सर्वविदित है कि दीर्घ मंथन के बाद डॉक्टर हेडगेवार जी के मन में उत्पन्न विचार कालांतर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में साकार हुआ। परंतु इस कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना था अतः नागपुर से अनेक लोग अलग-अलग स्थानों पर जाकर संघ कार्य में जुटे। नागपुर के आसपास पुणे में सबसे पहले कार्य प्रारंभ हुआ।

माना जाता हैं कि पहले पहल राजस्थान के बूंदी में मध्यभारत के कार्यकर्ताओं द्वारा थोड़ा बहुत संघ कार्य प्रारंभ किया गया था। 1940 में एक प्रवासी बच्छराज जी व्यास नागपुर से अपने गृहनगर डीडवाना आए। उन्होंने यहां डॉक्टर हेडगेवार जी की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जिसमें कुछ लोग एकत्र हुए परंतु संघ कार्य का विधिवत आरंभ राजस्थान में 1941 में हुआ जब विश्वनाथ जी लिमये प्रचारक बनकर अजमेर आए। उन्होंने प्रथम औपचारिक शाखा प्रारंभ की। उससे पहले गोविंद राव फडणवीस जो पुणे से जोधपुर पढ़ने आए थे, उन्होंने जोधपुर में कुछ कार्य प्रारंभ किया था। 1942 में कुशाभाऊ ठाकरे को राजपुताने से लगते हुए मालवा में संघ विस्तार के लिए भेजा गया, उन्होंने अपना केंद्र नीमच को बनाया था। तभी उन्होंने चित्तौड़ में दुर्ग पर पहली बार संघ की शाखा आरम्भ की थी।

भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पंडित बच्छराज जी व्यास लिखते हैं – “1935-40 के आसपास राजस्थान राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत पिछड़ा हुआ और किंकर्तव्यविमूढ स्थिति में था क्योंकि ब्रिटिश नीति ने समाज में संकुचित जातीयता और क्षेत्रीयता के बीज बो रखे थे। फिर भी यहाँ के लोगों में हिंदुत्व के प्रति आदर था। किंतु शासन का भय छोटे बड़े सभी में था, उस समय अंग्रेजों का मुख्यालय अजमेर था, उसके कारण अंग्रेजी शासकों के जासूसों का जाल सर्व दूर फैला हुआ था। प्रतिबन्ध और तत्कालीन सरकारी सेंसर से बचने के लिए स्वयंसेवक पत्र व्यवहार तक नहीं करते थे।
कार्यकर्ताओं के बीच चाचा जी, ताऊ जी, दादा भाई, मास्टर साहब और भैया जी जैसे कौटुंबिक संबोधन काम में लिए गए। बाद में यही सम्बोधन प्रगाढ़ अपनत्व के प्रतीक बन गए। इनसे जाति, भाषा, प्रांत और रहन-सहन के भेद मिटकर एकात्मता की अनुभूति होती थी।

1944 के बाद संघ की शाखाओं में तीव्र वृद्धि हुई। 1944 में राजस्थान में 50 शाखाएं थीं। 1945 तक यह 100 तक पहुंच गई। 1946 के अधिकारी शिक्षा वर्ग में लगभग 125 नियमित शाखाओं और 15-20 नई शाखाओं के स्वयंसेवको ने भाग लिया था। इस समय जयपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर और जोधपुर में भी कार्य बढा। आश्चर्यजनक बात यह है कि इस प्रगति के वाहक मात्र 18 वर्ष की औसत आयु के स्वयंसेवक थे।

संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (पूजनीय गुरु जी) के राजस्थान प्रवास:- 1945-46 में संघ को यहां के राज परिवारों का भी खूब सहयोग मिला। मेवाड़ के महाराणा भगवत सिंह जी ने गुरु जी से मिलने के बाद संघ कार्य में जुट गए । वे 1969 में सर्वसम्मति से विश्व हिंदू परिषद के दूसरे अध्यक्ष भी बने। उन्होंने न केवल देश अपितु विदेश में भी विश्व हिंदू परिषद का काम किया। उनकी ही अध्यक्षता में जुलाई 1984 न्यूयॉर्क में दसवां विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन हुआ। जिसमें 50 देश के 4700 प्रतिनिधित्व ने भाग लिया था।

जोधपुर के प्रधानमंत्री सर डोनाल्ड फील्ड और जयपुर के प्रधानमंत्री सर मिर्जा इस्माइल के नकारात्मक रवैये के बावजूद कुंवर रूपनारायण पुरोहित और गृहमंत्री श्री अमर सिंह के सहयोग से पूजनीय गुरु जी का राजस्थान प्रवास सफल रहा।

1950-55 के बीच राजस्थान में कुल सौ शाखाएं थी और प्रचारकों की संख्या केवल 13 थी। 1959 में तत्कालीन प्रांत प्रचारक ब्रह्मदेव जी के आह्वान के बाद प्रचारकों की संख्या बढ़ पाई। 1962 में राजस्थान प्रांत का अलग से शिक्षा वर्ग लगने लगा और शाखाओं की संख्या 400 तक पहुंच गई। बाद में राजस्थान को संघ कार्य की दृष्टि से तीन प्रांतों में बांटा गया। जयपुर, जोधपुर और चित्तौड़। राजस्थान प्रथम बार एक क्षेत्र बना। पहले संघ दृष्टि से चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ आदि मंदसौर जिले का हिस्सा था बाद कार्य वृद्धि होने के साथ चित्तौड़ जिला अलग जिला बना दिया गया, अभी चित्तौड़गढ़ को दो जिला बाटा हुआ हैं चित्तौड़ व निम्बाहेड़ा। यह चित्तौड़ विभाग का हिस्सा हैं जिसमें प्रतापगढ़ भी आता हैं।

1970 के बाद, विशेषकर 1975 में आपातकाल में संघ के स्वयंसेवकों को जेलों में ठूँस दिया गया था। किन्तु जैसे ही 1977 में प्रतिबंध हटा, तो राजस्थान में संघ का कार्य तीव्र गति से आगे बढ़ा। अनेक प्रचारक निकले। 1989 में डॉक्टर हेडगेवार की जन्मशती में भी अनेक गाँवों तक संघ का विचार लेकर यहाँ के कार्यकर्ता गए तथा सेवा के काम शुरू हुए।

1990 और1992 की राममंदिर कारसेवा में भी राजस्थान के स्वयंसेवकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। हमारे छह स्वयंसेवक तो बलिदान भी हो गए, परंतु जोश कम नहीं हुआ, समस्त समाज साथ खड़ा हो गया। 2001 के राष्ट्र जागरण अभियान में संघ के स्वयंसेवकों ने लाखों परिवारों से संपर्क किया तथा संघ का विचार समझाया।
2006 में पूजनीय गुरुजी की जन्म शताब्दी पर तो तीन वर्षों तक तैयारी चली। मंडल स्तर, यानी हर पाँचवें-छठे गाँव में संघ की शाखा ले जाने के प्रयास हुए और इसमें अधिकतम सफलता मिली। बड़े-बड़े हिंदू सम्मेलन, सद्भाव बैठकें आदि आयोजित करके संघ ने समाज में व्यापक रूप धारण कर लिया।हाल ही अयोध्या में राममंदिर निर्माण हेतु धन संग्रह भेंट में भी राजस्थान प्रथम स्थान पर रहा। 500 करोड़ से अधिक राशि स्वयं में एक कीर्तिमान है।

समाज परिवर्तन और स्वयंसेवक
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय परिसरों के अंदर एक संस्कारयुक्त वातावरण खड़ा किया, विद्यार्थियों में देशभक्ति के भाव जगाए। उन्होंने अन्य छात्रों की तरह तोड़फोड़ करने के बजाय रचनात्मक कार्य किए। आज यह देश के सबसे बड़े विद्यार्थी संगठन के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

विश्व हिंदू परिषद ने पृथ्वीराज चौहान के धर्मान्तरित वंशजों की घर वापसी का बड़ा कार्यक्रम चलाया और उनके रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा और आस्था के लिए कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं।
साथ ही बांसवाड़ा में मिशनरियों के भय और प्रलोभन के शिकार भोले भाले वनवासी बन्धुओं की घर वापसी कराकर उनका समुचित पुनर्वास किया।

विद्या भारती संगठन ने हजारों विद्यालय चलाकर शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए, जैसे- शिक्षा का भारतीयकरण, संस्कारयुक्त शिक्षा, और बहुत छोटे स्थानों पर भी निजी विद्यालय जैसी शैक्षिक सुविधाओं की उपलब्धता। आज यहां से पढ़े हुए विद्यार्थी समाज में अत्यंत सकारात्मक और सद्भावपूर्ण वातावरण का निर्माण कर रहे है।

स्वदेशी जागरण मंच ने विशेषकर कोरोना में स्वावलंबन और स्थानीय उत्पादन को व्यावहारिक जीवन में लाने के बहुत प्रयास किए और सफलता भी मिली।

भारतीय मजदूर संघ ने भी मजदूरों का बड़ा संगठन तो निर्मित किया ही, साथ ही असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को भी दिशा दी, उनके लिए आवाज उठाई। उनमें बढ़ने वाली असाध्य बीमारियों के लिए सरकारों को जागरूक किया।

भारत विकास परिषद राजस्थान में 15 से अधिक स्थानों पर निःशुल्क या न्यूनतम मूल्य में चिकित्सा सुविधाऐं उपलब्ध करवा रही है।राजस्थान में बड़ी संख्या में घुमंतू समाज के लोग है जो देश भर में फैले हुए है। इनमें शिक्षा का अभाव है, अतः घुमंतू समाज के छात्रावास चलाकर, उनके सरकारी कागजात बनवाकर और हजारों लोगों को पट्टे दिलवाकर उनको घर दिए गए हैं।

सेवा भारती संभवतः पूरे भारत में सबसे अधिक सेवा कार्य करने वाला संगठन है। पिछड़ी बस्तियों में इसने बाल संस्कार केंद्र बच्चों को स्कूल पहुँचाने, चिकित्सा इत्यादि के शिविर लगाकर, अनेक सेवा कार्य करके पिछड़े लोगों के जीवन स्तर को सुधारा है।

वनवासी कल्याण आश्रम ने मिशनरी कुचक्र को असफल किया है। वनवासी बालकों की शिक्षा के लिए स्कूलें, हॉस्टल, एकल विद्यालय, चिकित्सा के लिए मोबाइल वैन और उनको खेलकूद में प्रोत्साहित करने के लिए अनेक सारी प्रतियोगिताएँ करवाकर उनको मुख्यधारा में लाने हेतु प्रयासरत है।

राजस्थान में ग्राम विकास के क्षेत्र में 70 से अधिक गांवों को मॉडल के रूप में संघ ने खड़ा किया है, जहां कलह, क्लेश, मुकदमा इत्यादि नहीं है, रोजगार का अभाव नहीं है तथा सामाजिक समरसता, स्वच्छता और जल संरक्षण आदि के उदाहरण निर्मित हुएहैं।

समरसता के क्षेत्र में अनेक ट्रस्टों ने अपने धार्मिक मंदिरों को सबके लिए खोलने का आग्रह स्वीकार किया है। जब भी कोई सामाजिक विघटन की घटना होती है, संघ के स्वयंसेवक तुरंत वहां पर सद्भाव बनाने का प्रयास करते हैं।

कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से लाखों घरों में परंपरागत हिंदू पद्धति से जीवन जीने को प्रेरित करने वाले संवाद स्थापित हो रहे हैं। राजस्थान एक शुष्क क्षेत्र है जहां वृक्ष कम है, पानी की कमी है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण की गतिविधियों ने लाखों पेड़ लगाकर शुष्क भूमि के फेफड़ों को स्वस्थ किया है। जल संरक्षण के भीलवाड़ा इत्यादि के बहुत शानदार मॉडल हैं।

इस प्रकार राजस्थान में संघ अपनी स्थापना से लेकर आज दिवस तक अनवरत रूप से ‘चरैवेति चरैवेति’ वाक्य को चरितार्थ करते हुए समाज सेवा और उसके उत्थान में सम्पूर्ण निष्ठा के साथ लगा हुआ है। संघ समाज के लिए जिस आदर्श का पालन करता है, वह है-
दम्यत दत्त… (बृहदारण्यक उपनिषद)
निज सुख को न्योछावर कर राष्ट्रहित सर्वस्व दो।

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