मुंबई : भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की हालिया शोध रिपोर्ट ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के पिछले दो दशकों के असाधारण विकास की तस्वीर साफ की है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2005 से 2025 के बीच बैंकों में जमा राशि (Deposits) ₹18.4 लाख करोड़ से 13 गुना बढ़कर ₹241.5 लाख करोड़ हो गई है। इसी दौरान ऋण वितरण (Advances) में भी भारी उछाल देखा गया, जो ₹11.5 लाख करोड़ से बढ़कर ₹191.2 लाख करोड़ पर पहुँच गया है। यह डेटा न केवल बैंकिंग प्रणाली की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विस्तार और बढ़ती वित्तीय गहराई का भी प्रमाण है।
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष क्रेडिट-डिपॉजिट (C-D) अनुपात में वृद्धि है, जो 2005 के 63% से बढ़कर 2025 में 79% हो गया है। यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था में ऋण की मांग जमा राशि के मुकाबले अधिक तेज रही है। इसके अलावा, भारतीय परिवारों के व्यवहार में एक बड़ा ‘पैराडाइम शिफ्ट’ देखा गया है। निवेशक अब पारंपरिक बैंक बचत के बजाय शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड जैसे वित्तीय साधनों को प्राथमिकता दे रहे हैं। विशेष रूप से गुजरात, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पूंजी का प्रवाह बैंकिंग जमा की तुलना में वित्तीय बाजारों की ओर अधिक तेजी से बढ़ा है।
बैंकिंग परिसंपत्तियों की जीडीपी में हिस्सेदारी भी वित्त वर्ष 2021 के 77% से बढ़कर 94% हो गई है, जो महामारी के बाद बैंकों की बैलेंस शीट में आए सुधार को रेखांकित करती है। डिजिटल क्रांति का असर भी स्पष्ट है; कुल डिजिटल भुगतान में यूपीआई (UPI) की हिस्सेदारी 85% तक पहुँचने का अनुमान है। बुनियादी ढांचे के स्तर पर भी भारत ने प्रगति की है, जहाँ प्रति 1 लाख वयस्कों पर बैंक शाखाओं की संख्या बढ़कर 16 हो गई है। शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण भारत में भी वित्तीय समावेशन के चलते बैंकिंग गतिविधियों में सकारात्मक सुधार दर्ज किया गया है।
