Tuesday, November 3, 2026
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डूड़ी में विकास के नाम पर लाखों खर्च, न रोजगार मिला न सुविधा… अब खंडहर बन रहे भवन

कटनी /पिपरिया सहलावन — शासन की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और लोगों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये की लागत से विभिन्न निर्माण कार्य कराए जाते हैं। उद्देश्य यही होता है कि इन भवनों और संसाधनों का उपयोग ग्रामीणों की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ रोजगार के अवसर पैदा करने में भी हो। लेकिन निर्माण के बाद यदि इनकी देखरेख, उपयोग और संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया जाए तो यही सरकारी संपत्ति कुछ वर्षों में अपनी उपयोगिता खोकर खंडहर में तब्दील हो जाती है। ऐसा ही एक मामला ग्राम पंचायत हरदी के अंतर्गत आने वाले डूड़ी गांव में सामने आया है, जहां करीब दो दशक पहले लाखों रुपये की लागत से बनाए गए दोना-पत्तल शेड और पशु शेड आज बदहाली की तस्वीर बनकर रह गए हैं।

ग्रामीणों के अनुसार करीब 20 वर्ष पूर्व गांव में डेयरी संचालन की योजना को ध्यान में रखते हुए पशु शेड का निर्माण कराया गया था। वहीं इसके सामने सड़क किनारे दोना-पत्तल निर्माण से संबंधित शेड भी बनाया गया था। निर्माण के समय इन भवनों को लेकर ग्रामीणों में उम्मीद जगी थी कि इनका उपयोग होने से गांव में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय लोगों को इसका लाभ मिलेगा। लेकिन समय बीतने के साथ इन भवनों का उपयोग और रखरखाव लगभग समाप्त हो गया।

करोड़ों की नहीं, लेकिन लाखों की सरकारी संपत्ति यूं ही बर्बाद

ग्रामीणों का कहना है कि भवनों के निर्माण में सरकारी राशि खर्च हुई, लेकिन आज स्थिति यह है कि जिन भवनों से ग्रामीणों को सुविधा और रोजगार मिलना था, वे खुद संरक्षण के अभाव में बदहाली का शिकार हैं। पशु शेड के अंदर और बाहर बड़ी-बड़ी झाड़ियां एवं झाड़-झंखाड़ उग आए हैं। भवन का उपयोग नहीं होने के कारण धीरे-धीरे यह स्थान वीरान होता गया और अब खंडहरनुमा स्थिति में पहुंच चुका है।

दोना-पत्तल शेड की हालत भी कुछ अलग नहीं है। देखरेख और संचालन के अभाव में भवन की उपयोगिता समाप्त हो गई है। ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि यदि इन भवनों का उपयोग ही नहीं होना था तो इनके निर्माण पर खर्च की गई राशि का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?

स्कूल के नजदीक खंडहर बना चिंता का कारण

सबसे गंभीर स्थिति पशु शेड को लेकर बताई जा रही है, क्योंकि यह स्कूल के आसपास स्थित है। ग्रामीणों के मुताबिक भवन के बाहर और अंदर घने झाड़-झंखाड़ होने के कारण दिन में भी यहां जाना मुश्किल लगता है। रात के समय तो यह स्थान और भी अधिक असुरक्षित नजर आता है।

ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के बीच भी इस सुनसान और झाड़ियों से घिरे भवन को लेकर भय का माहौल बना रहता है। स्कूल की छुट्टी के बाद भवन का उपयोग कथित रूप से शराब पीने और नशा करने वाले लोगों द्वारा किए जाने की शिकायत भी ग्रामीणों और शिक्षकों द्वारा बताई गई है।

ग्रामीणों का आरोप है कि यदि लंबे समय से अनुपयोगी पड़े भवन के प्रवेश द्वार पर ताला लगा दिया जाता या परिसर की साफ-सफाई कराकर सुरक्षा के इंतजाम किए जाते तो स्थिति काफी हद तक नियंत्रित हो सकती थी। इसके बावजूद लंबे समय तक इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।

टंकी के पास भी नशेड़ियों के जमावड़े की शिकायत

ग्रामीणों के अनुसार स्कूल के पीछे नवनिर्मित पानी की टंकी और बोरवेल के आसपास भी दिनभर असामाजिक तत्वों के जमावड़े की समस्या बनी रहती है। ग्रामीणों और शिक्षकों का कहना है कि सार्वजनिक उपयोग की जगहों के आसपास इस तरह की गतिविधियां बच्चों और ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय हैं।

ग्रामीणों की मांग है कि पंचायत को इन स्थानों की नियमित निगरानी, साफ-सफाई और सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही जहां आवश्यकता हो वहां गेट, ताला या अन्य सुरक्षा व्यवस्था तत्काल की जानी चाहिए।

गांव में प्रवेश करते ही नजर आती है जर्जर स्कूल बिल्डिंग

डूड़ी गांव की समस्या केवल दो पुराने भवनों तक सीमित नहीं है। गांव की ओर प्रवेश करते ही सड़क किनारे स्थित पुराने स्कूल भवन की जर्जर इमारत भी ग्रामीणों का ध्यान आकर्षित करती है। ग्रामीणों के मुताबिक भवन काफी समय से अनुपयोगी और जर्जर स्थिति में है। ऐसे में इस भवन को डिस्मेंटल कराकर स्थल का बेहतर उपयोग किए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

हालांकि इस भवन का स्वामित्व शिक्षा विभाग के अधीन बताया जा रहा है, जिसके चलते पंचायत स्तर से सीधे कार्रवाई संभव नहीं है। इसके बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित विभाग से समन्वय कर जर्जर भवन के संबंध में निर्णय लिया जाना चाहिए, ताकि किसी दुर्घटना की आशंका को टाला जा सके।

पुराने खंडहरों की जगह बने रोजगारमूलक भवन

ग्रामीण दुर्गेश पटेल, रविन्द्र सिंह, गुड्डा कोल, राकेश और अमित सिंह सहित अन्य ग्रामीणों का कहना है कि यदि पुराने और अनुपयोगी भवनों की स्थिति को सुधारने के बजाय उनकी जगह गांव की जरूरत के अनुसार सामुदायिक भवन, रोजगारमूलक केंद्र या अन्य उपयोगी निर्माण कराया जाए तो इसका सीधा लाभ ग्रामीणों को मिल सकता है।

ग्रामीणों के अनुसार आज गांव के युवाओं को रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है। यदि पंचायत स्तर पर दोना-पत्तल निर्माण, लघु उद्योग, प्रशिक्षण केंद्र या अन्य रोजगारोन्मुखी गतिविधियों के लिए भवन उपलब्ध कराया जाए तो सरकारी संपत्ति का वास्तविक उद्देश्य भी पूरा हो सकता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं।

पंचायत ने कहा—जांच के बाद मरम्मत या डिस्मेंटल पर होगा निर्णय

मामले को लेकर ग्राम पंचायत के सचिव शैलेन्द्र परौहा का कहना है कि पुराना स्कूल भवन शिक्षा विभाग के अधीन है। वहीं अन्य दोनों पुराने भवनों को संबंधित इंजीनियर से दिखवाया जाएगा। भवनों की स्थिति का परीक्षण कराने के बाद यह तय किया जाएगा कि उनकी मरम्मत कराकर उपयोग में लिया जा सकता है अथवा उन्हें डिस्मेंटल कराने की आवश्यकता है।

सचिव ने यह भी कहा कि यदि पशु शेड में असामाजिक तत्वों का आना-जाना बना हुआ है तो पंचायत की ओर से उसके गेट पर ताला लगाने की व्यवस्था जल्द की जाएगी। इसके अलावा बोरवेल और पानी की टंकी के आसपास भी सुरक्षा व्यवस्था किए जाने का प्रयास किया जाएगा।

सवाल सिर्फ भवनों का नहीं, सरकारी धन के सदुपयोग का है

डूड़ी गांव की यह तस्वीर ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और निर्माण के बाद सरकारी संपत्तियों के रखरखाव पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। किसी भी योजना का उद्देश्य केवल भवन खड़ा करना नहीं, बल्कि उसका वर्षों तक उपयोग सुनिश्चित करना होता है। यदि निर्माण के बाद भवन बंद पड़े रहें, झाड़ियों से घिर जाएं और धीरे-धीरे खंडहर में बदल जाएं तो ऐसे निर्माण की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब देखना यह होगा कि पंचायत और संबंधित विभाग इन पुराने भवनों की वास्तविक स्थिति का तकनीकी परीक्षण कब कराते हैं और मरम्मत, सुरक्षा अथवा डिस्मेंटल को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि वर्षों से अनुपयोगी पड़े इन भवनों को सिर्फ सरकारी संपत्ति के रूप में खड़ा छोड़ने के बजाय गांव की जरूरत और युवाओं के रोजगार को ध्यान में रखते हुए इनका सार्थक उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा।

मुकेश व्यवहार पिपरिया सहलावन

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