डिंडोरी /खबर डिजिटल /शैलेश नामदेव/ खून-पसीना बहाकर पूरे देश का पेट भरने वाले अन्नदाता की उम्मीदें आज सरकारी व्यवस्था के टपकते पानी में बह रही हैं। जिला मुख्यालय स्थित मुख्य सरकारी खाद गोदाम की जर्जर और टूटी छत से गिरती पानी की हर एक बूंद, इस समय प्रशासनिक संवेदनहीनता की गवाही दे रही है। महीनों की कड़ी मेहनत के बाद जब किसान आस लगाए बैठा था कि उसे खरीफ की फसल के लिए खाद मिलेगी, तब उसे उपहार में मिल रही हैं पानी से भीगी हुई खाद की बोरियां। अधिकतर खाद आज गोदाम के फर्श पर पानी टपकने से बर्बाद हो रही है, और इसके साथ ही बर्बाद हो रहा है किसान का आने वाला कल।
काली घटाएं देखकर जहाँ कभी किसान का दिल झूम उठता था, आज वही बारिश उसके लिए आफत बन गई है। इस समय खेतों में बुआई और रोपाई का सबसे महत्वपूर्ण खरीफ सीजन चल रहा है। समय हाथ से निकलता जा रहा है, और बाजार में खाद की भारी किल्लत है। ऐसे में किसानों के पास रोने और इस भीगी हुई, खाद को चुपचाप स्वीकार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
अपनी फटी जेब से पाई-पाई जोड़कर खाद खरीदने आए एक बुजुर्ग किसान ने नम आंखों से बताया कि ”बाबूजी, खेती का समय बीता जा रहा है। अगर आज खाद नहीं डाली, तो सालभर बच्चे भूखे रह जाएंगे। जानते हैं कि यह भीगी हुई खाद मिट्टी हो चुकी है, लेकिन सरकारी बाबू कहते हैं कि लेना है तो लो, नहीं तो आगे बढ़ो। हमारी सुनने वाला कोई नहीं है।”
कृषि के जानकार साफ कहते हैं कि नमी और पानी के संपर्क में आते ही खाद के पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। जो खाद फसलों को जीवन देने के लिए बनी थी, वह अब बेअसर हो चुकी है।
जब गोदाम प्रभारी चैन सिंह मरावी से बात की गई, तो उनके जवाब में वही चिर-परिचित सरकारी ठंडापन था। उन्होंने किसानों को जानबूझकर खराब खाद देने की बात को तो नकार दिया, लेकिन यह जरूर माना कि इमारत बेहद पुरानी और जर्जर है, जिससे पानी टपक रहा है। सवाल यह उठता है कि जब पूरा देश जानता है कि जून-जुलाई में मानसून आता है, तो समय रहते इस गोदाम की छत पर एक तिरपाल तक क्यों नहीं डाली गई? क्या सरकारी दफ्तरों में बैठे अधिकारियों को किसानों के पसीने की कोई कीमत नहीं मालूम?
अब आर-पार की लड़ाई
इस लापरवाही ने अब डिंडोरी के किसानों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। किसानों और स्थानीय संगठनों ने अब प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
इस घोर लापरवाही की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच हो ताकि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जा सकें।
भीगी हुई खाद के वितरण पर तुरंत रोक लगाई जाए और जिन किसानों को यह खराब खाद थमाई गई है, उन्हें बदलकर अच्छी गुणवत्ता की खाद मुफ्त दी जाए।
जर्जर हो चुके इस गोदाम की तुरंत मरम्मत हो, ताकि अगली बारिश में किसी और किसान की उम्मीदें इस तरह पानी में न सड़ें।
जब तक खेतों की मिट्टी को सींचने वाले किसान की आंखों से बेबसी के आंसू टपकते रहेंगे, तब तक विकास के सारे दावे खोखले और बेमानी हैं। प्रशासन को अब गहरी नींद से जागना ही होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
