डिंडोरी/शेलेश नामदेव/खबर डिजिटल/ नर्मदा नदी पर प्रस्तावित राधोपुर बहुउद्देशीय परियोजना बाँध को लेकर डूब प्रभावित क्षेत्र के किसानों और आदिवासी समुदाय का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। परियोजना को आदिवासी अधिकारों, ग्राम सभा की सर्वोच्चता और संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध बताते हुए प्रभावित ग्रामीणों ने बाँध को पूर्णतः निरस्त करने की माँग की है। इसी सिलसिले में डूब प्रभावित किसानों ने जिला मुख्यालय पहुँचकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा और अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराईं।
अनुसूचित क्षेत्र में बिना सहमति परियोजना का आरोप
डूब प्रभावितों का कहना है कि राधोपुर बहुउद्देशीय परियोजना का पूरा क्षेत्र संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाला अनुसूचित क्षेत्र है। ऐसे क्षेत्रों में किसी भी बड़े विकास कार्य से पहले ग्राम सभाओं की स्पष्ट सहमति लेना अनिवार्य है, लेकिन इस परियोजना में ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना ही प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। ग्रामीणों ने इसे पेसा कानून, वन अधिकार अधिनियम और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 का सीधा उल्लंघन बताया।
मुडियाकला में हुई महापंचायत, सर्वसम्मति से हुआ विरोध
डूब प्रभावित किसान संघर्ष समिति के तत्वावधान में 17 दिसंबर 2025 को विकासखंड डिंडोरी के ग्राम मुडियाकला में एक विशाल महापंचायत का आयोजन किया गया था। महापंचायत में सैकड़ों ग्रामीणों, किसानों और आदिवासी समाज के लोगों ने भाग लिया। बैठक में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि राधोपुर बहुउद्देशीय परियोजना बाँध को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा और इसे तत्काल निरस्त किया जाए।
99 प्रतिशत प्रभावित आबादी आदिवासी
ग्रामीणों ने बताया कि प्रस्तावित बाँध से प्रभावित होने वाले परिवारों में लगभग 99 प्रतिशत लोग अनुसूचित जनजाति से हैं। इसके बावजूद न तो विस्थापन की स्पष्ट नीति सामने रखी गई है और न ही पुनर्वास, मुआवजा एवं आजीविका की कोई ठोस योजना बताई गई है। इससे प्रभावित परिवारों में गहरी चिंता और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है।
उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अवहेलना का आरोप
किसानों का आरोप है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 2013 में दिए गए निर्णय में अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति को सर्वोपरि माना गया है। इसके बावजूद राधोपुर परियोजना को आगे बढ़ाना न्यायालय के आदेशों और संवैधानिक भावना की अवहेलना है।
70 हजार से अधिक आदिवासियों की आस्था और संस्कृति पर खतरा
डूब प्रभावितों का कहना है कि इस परियोजना से करीब 70 हजार से अधिक गोंड आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक स्थल, पारंपरिक गाँव, खेती और जीवनशैली पर सीधा खतरा उत्पन्न होगा। यह क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध होने के साथ-साथ भूकंपीय दृष्टि से भी संवेदनशील बताया जा रहा है।
विकास के नाम पर विस्थापन स्वीकार नहीं
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया जाना स्वीकार्य नहीं है। उनका कहना है कि आदिवासी समाज पहले ही कई परियोजनाओं के कारण विस्थापन झेल चुका है और राधोपुर बाँध उसी पीड़ा को दोहराएगा।
आंदोलन की चेतावनी
डूब प्रभावित किसानों और ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि राधोपुर बहुउद्देशीय परियोजना बाँध को निरस्त नहीं किया गया, तो वे ग्राम सभाओं के निर्णयों के आधार पर संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक आंदोलन छेड़ेंगे।


