भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन इसकी तैयारी ने सियासी हलचल तेज कर दी है। 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में अगला चुनाव भाजपा के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। इसी चुनाव के संदर्भ में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की भूमिका भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकती है। मोहन यादव के लिए यूपी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनका यादव समाज से जुड़ा राजनीतिक चेहरा भाजपा की व्यापक सामाजिक रणनीति में उपयोगी माना जाता है। ऐसे में 2027 के चुनाव में पार्टी उन्हें उत्तर प्रदेश में किस स्तर पर इस्तेमाल करती है और उनकी चुनावी भूमिका कितनी प्रभावी रहती है, यह उनके राष्ट्रीय राजनीतिक कद के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यूपी चुनाव के नतीजे सीधे तौर पर मोहन यादव के पद या भविष्य का फैसला करेंगे। लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए चुनावी प्रदर्शन किसी भी नेता की राजनीतिक उपयोगिता का महत्वपूर्ण पैमाना जरूर बन सकता है।
यूपी में मोहन यादव की भूमिका क्यों अहम हो सकती है?
उत्तर प्रदेश में यादव मतदाताओं का बड़ा राजनीतिक आधार है और समाजवादी पार्टी लंबे समय से इस सामाजिक समूह के बीच मजबूत पकड़ रखती है। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती केवल सत्ता बनाए रखने की नहीं, बल्कि विपक्ष के पारंपरिक सामाजिक समीकरणों में सेंध लगाने की भी है। मोहन यादव को यदि भाजपा यूपी के चुनावी अभियान में प्रमुखता देती है, तो पार्टी उनके जरिए यादव समाज तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश कर सकती है। यह रणनीति खासतौर पर उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हो सकती है जहां यादव वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। समाजवादी पार्टी भी 2027 के लिए अपने सामाजिक गठजोड़ को विस्तार देने में जुटी है। हालिया राजनीतिक गतिविधियों में अखिलेश यादव की ओर से ब्राह्मण समुदाय तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश भी सामने आई है।
मोहन यादव के सामने दोहरी चुनौती
मोहन यादव के सामने चुनौती सिर्फ उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए प्रचार करने की नहीं होगी। उन्हें एक तरफ मध्य प्रदेश में अपनी सरकार और संगठन की पकड़ मजबूत रखनी होगी, वहीं दूसरी तरफ पार्टी अगर यूपी में जिम्मेदारी देती है तो वहां भी प्रभावी भूमिका निभानी होगी। यानी 2027 का चुनाव उनके लिए सीधे तौर पर मध्य प्रदेश का चुनाव नहीं होगा, लेकिन उनकी राष्ट्रीय उपयोगिता का राजनीतिक टेस्ट जरूर बन सकता है। अगर वह यूपी में भाजपा के लिए यादव वोटरों के बीच प्रभावी माहौल बनाने में सफल रहते हैं और पार्टी सत्ता में वापसी करती है, तो उनके राजनीतिक कद को इससे फायदा मिल सकता है।
जीत मिली तो बढ़ सकता है राष्ट्रीय कद
भाजपा की राजनीति में चुनावी सफलता नेताओं की भूमिका तय करने में महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में यदि मोहन यादव को यूपी में बड़ी जिम्मेदारी मिलती है और उनके नेतृत्व वाले क्षेत्रों में पार्टी मजबूत प्रदर्शन करती है, तो केंद्र में उनकी भूमिका को लेकर नई चर्चाएं शुरू होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक जिम्मेदारी, दूसरे राज्यों में चुनावी प्रचार की बड़ी भूमिका या केंद्रीय राजनीति में किसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो सकती है। लेकिन यह पूरी तरह चुनावी प्रदर्शन और पार्टी नेतृत्व के फैसले पर निर्भर करेगा। जानकारी बता रहे हैं कि बिहार में मोहन यादव के सफल प्रचार के चलते यूपी चुनाव पर सीधा असर वो डाल सकते हैं।
अगर प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा तो?
दूसरी स्थिति ज्यादा दिलचस्प होगी। यदि भाजपा को यूपी में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती और मोहन यादव की भूमिका पार्टी के घोषित सामाजिक या चुनावी लक्ष्य को हासिल करने में प्रभावी नहीं रहती, तो केंद्रीय नेतृत्व उनके राजनीतिक इस्तेमाल की रणनीति पर पुनर्विचार कर सकता है। इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि मध्य प्रदेश में उनके नेतृत्व पर तत्काल कोई असर पड़े। बल्कि पार्टी उन्हें भविष्य में किस भूमिका में इस्तेमाल करे, यह आकलन किया जा सकता है। यानी यूपी चुनाव मोहन यादव के लिए ‘अग्निपरीक्षा’ से ज्यादा उनकी राष्ट्रीय राजनीतिक उपयोगिता का लिटमस टेस्ट बन सकता है।
BJP के लिए भी यूपी सबसे बड़ा मिशन
उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि विपक्षी दल अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा भी संगठनात्मक स्तर पर चुनावी तैयारी तेज कर रही है। हाल ही में पार्टी ने यूपी के लिए नई संगठनात्मक टीम का ऐलान किया है, जिसे 2027 के चुनाव की तैयारी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। ऐसे में आने वाले महीनों में यह साफ हो सकता है कि भाजपा मोहन यादव को यूपी के चुनावी मैदान में कितनी बड़ी जिम्मेदारी देती है।
असली सवाल 2027 के बाद उठेगा
मोहन यादव के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह नहीं होगा कि उन्हें यूपी में प्रचार के लिए भेजा जाता है या नहीं। असली सवाल यह होगा कि उन्हें दी गई जिम्मेदारी के बाद भाजपा का प्रदर्शन कैसा रहता है और केंद्रीय नेतृत्व उस प्रदर्शन को किस नजर से देखता है। यदि भाजपा मजबूत वापसी करती है और मोहन यादव की भूमिका को सफल माना जाता है, तो राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद और बढ़ सकता है। इसके उलट, अपेक्षित परिणाम नहीं आने पर पार्टी उनकी चुनावी भूमिका और भविष्य की जिम्मेदारियों का नए सिरे से आकलन कर सकती है। फिलहाल इतना तय है कि 2027 का यूपी चुनाव सिर्फ योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव की सीधी राजनीतिक लड़ाई नहीं होगा। भाजपा के भीतर भी कई नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता और भविष्य की भूमिका का आकलन इसी चुनाव के प्रदर्शन से जुड़ सकता है। मोहन यादव भी इस व्यापक राजनीतिक परीक्षा का एक महत्वपूर्ण चेहरा बन सकते हैं।
