डिंडोरी /शैलेश नामदेव /खबर डिजिटल/ शिक्षा को विकास की नींव कहा जाता है, लेकिन डिंडोरी जिले में यह नींव ही जर्जर दिखाई दे रही है। जिले के मेहंदवानी विकासखंड अंतर्गत भोड़ासार माल ग्राम के पोषक ग्राम नेटी टोला में संचालित प्राथमिक शाला की स्थिति किसी भी जिम्मेदार तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यहाँ नौनिहालों का भविष्य पक्के विद्यालय भवन में नहीं, बल्कि घास-फूस से बनी एक अस्थायी झोपड़ी में संवारा जा रहा है।
विद्यालय के पास नहीं भवन
विद्यालय के पास स्वयं का भवन नहीं होने के कारण पालकों और शिक्षकों की मजबूरी ने झोपड़ी को ही कक्षा का रूप दे दिया है। इसी झोपड़ी के नीचे पहली से पाँचवीं तक की कक्षाएँ एक साथ संचालित की जा रही हैं। हालात ऐसे हैं कि पहली कक्षा का छात्र पाँचवीं की पुस्तकें सुनने को मजबूर है, तो पाँचवीं का छात्र पहली कक्षा का पाठ पढ़ते हुए नजर आता है।
एक शिक्षक, 37 विद्यार्थी
प्राथमिक शाला में कुल 37 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिनकी शिक्षा की जिम्मेदारी केवल एक शिक्षक पर है। सीमित संसाधनों और अव्यवस्थित वातावरण में शिक्षक बच्चों को पढ़ाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन भवन और सुविधाओं के अभाव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
बारिश में और भी गंभीर हालात
बरसात के मौसम में स्थिति और भयावह हो जाती है। तेज बारिश और हवा के बीच झोपड़ी के नीचे बैठकर पढ़ाई करना बच्चों के लिए जोखिम भरा साबित हो रहा है। न तो सुरक्षित बैठने की व्यवस्था है और न ही मौसम से बचाव का कोई ठोस इंतजाम। इससे बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों पर खतरा मंडरा रहा है।
शिकायतें हुईं, समाधान नहीं
ग्रामीणों ने बताया कि विद्यालय भवन निर्माण की मांग को लेकर 1 जुलाई 2025 को जनसुनवाई में शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके बाद डीएमसी को आवेदन भी सौंपा गया, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद न तो भवन निर्माण शुरू हुआ और न ही किसी वैकल्पिक व्यवस्था की गई। 20 अगस्त 2025 को सहायक आयुक्त, डिंडोरी को भी पूरे मामले की शिकायत की गई, परंतु अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
घास की झोपड़ी में संचालित यह विद्यालय केवल नेटी टोला की कहानी नहीं है, बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर है। सरकार और प्रशासन द्वारा शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावे किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।जब नौनिहालों का बचपन और भविष्य झोपड़ी की छाया में गुजर रहा हो, तो यह केवल एक स्कूल की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विफलता का संकेत है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिम्मेदार अधिकारी कब तक आंखें मूँदे रहेंगे और कब इन बच्चों को पक्की दीवारों के बीच सुरक्षित व सम्मानजनक शिक्षा का अधिकार मिल पाएगा।


