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Rang Panchami Katha: रंग पंचमी मनाने के पीछे यह है कारण… पुराणों में भी मिलता है उल्लेख

रंग पंचमी का त्योहार, खुशियों की बहार

भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ सनातन धर्म में रंग पंचमी के पर्व का बहुत महत्व है, जिसे होली के बाद पंचमी तिथि पर मनाया जाता है, इस दिन रंगों की बौछार के जरिए खुशियों का इजहार किया जाता है। यह पर्व चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन देवी-देवता धरती पर आकर भक्तों के साथ होली खेलते हैं, और उनकी मनोकामनाओं को पूरा करते हैं। मनुष्यों को फल प्राप्ति के लिए उनकी आराधना कर त्योहार को मनाया जाना चाहिए, और सबसे पहले अपने आराध्य को रंग गुलाल अर्पित करने चाहिए।

राधा कृष्ण की रंगपंचमी कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेता युग की शुरुआत में भगवान विष्णु ने ‘धुली वंदन’ किया था, जिसका अर्थ है कि उन्होंने विभिन्न तेजस्वी रंगों के रूप में अवतार लिया था। इन रंगों को जीवन में अंगीकार कर रोगों, दोषों और पापों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया जाता है। इसी तरह भगवान कृष्ण ने भी विभिन्न रंगों में अवतार लिया, और होली को ब्रह्मांड का एक तेजस्वी उत्सव बनाया। रंग बिरंगे त्योहार होली का संबंध भगवान कृष्ण के विभिन्न रूपों, कलाओं और गुणों से है। मान्यता है कि चैत्र मास की पंचमी को भगवान कृष्ण ने राधा जी के साथ होली खेली थी। उन्हें खेलते देखकर सभी गोपियां भी कृष्ण के साथ होली खेलने आ गईं। उस समय पृथ्वी पर एक मनमोहक दृश्य उत्पन्न हुआ, जिसे देखकर सभी देवी-देवता मंत्रमुग्ध हो गए। नतीजतन वे भी सभी गोपी और ग्वालों का रूप धारण करके पृथ्वी पर होली खेलने के लिए आ गए। उनके आगमन की खुशी में सभी ने पूरे वातावरण को रंगबिरंगा कर दिया। तभी से रंगपंचमी को गुलाल उड़ाने की परंपरा शुरू हुई। इसीलिये इस दिन मनुष्य भी देवी-देवताओं का आशीर्वाद पाने और श्रीकृष्ण की भक्ति को जीवन में उतारने के लिए रंग पंचमी का त्योहार मनाते हैं।

भगवान श्रीराम की कथा
हमारे कई त्योहार भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास पर आधारित है, इसी में रंग पंचमी भी शामिल है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक फाल्गुन मास की पंचमी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है। माना जाता है कि इसी दिन भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान चंदेरी से होकर अपनी यात्रा पूरी की थी और इस भूमि को अपने चरणों से पवित्र किया था। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने इसी दिन इस स्थान पर अपने कदम रखे थे। यही कारण है कि होली के पांच दिन बाद, करीला की पहाड़ी पर जनजाति के लोगों ने भगवान श्रीराम के आगमन पर रंग पंचमी का त्योहार मनाया था, जिसमें उन्होंने पारंपरिक नृत्य करने के साथ एक दूसरे पर अबीर गुलाल लगाकर भगवान का अभिवादन किया, जोकि बड़ी परंपरा बन गई, और पूरे देश में फैल गई।

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